Freedom Struggle: इन वीरांगनाओं का स्वतंत्रता संग्राम में रहा अहम योगदान, इतिहास के पन्नों में जिक्र

Freedom Struggle: इस साल 15 अगस्त 2022 में हमारे देश को आजाद हुए 75 साल पूरे होने वाले हैं। आजादी की लड़ाई में वीरों के साथ-साथ वीरांगनाओं की भी काफी भूमिका रही है। ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार भारत की आजादी का पहला स्वाधीनता संग्राम 1857 को माना जाता है। लेकिन इससे पहले भी ब्रिटिश हुकूमत को हिंदुस्तान से बाहर निकालने के लिए कई कोशिशें की गई थी। 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास के पन्ने आजादी से भरे हुए हैं। लेकिन संग्राम को केवल पुरुषों का नाम नहीं दिया जा सकता। स्वतंत्रता की लड़ाई में उन वीरांगनाओं का भी जिक्र हुआ है जिन्होंने अपनी जान की बाजी लगाकर आजादी दिलाई है।

रानी लक्ष्मीबाई

लक्ष्मी बाई का नाम इतिहास के पन्नों में बड़ी ही शौर्य और वीर गाथाओं के साथ लिया जाता हैं। आज भी वह बुंदेलखंड की कई लोग कहानियों और लोकगीतों में जीवंत होती हैं। अंग्रेजी हुकूमत करने वाले शासकों ने रानी लक्ष्मीबाई को झांसी के किले से निकालकर पेंशन लेने पर विवश किया था। लेकिन लक्ष्मीबाई ने हार ना मानते हुए अपनी लड़ाई लड़ी। रानी ने 1857 में पड़ोसी राज्यों और झांसी की गति के दूर के दावेदारों के साथ मिलकर एक बड़ी सेना बनाई और मार्च 1858 में झांसी पर हमला बोला। वहीं अंग्रेजों की बड़ी सैन्य शक्ति के सामने टिकी रही। अंग्रेजों ने 17 जून 1857 को ग्वालियर से 5 मील की दूरी पूरब कोटा की सराय की जंग में रानी पर गोली चलाई थी। जिस कारण रानी लक्ष्मीबाई घोड़े से गिर गई और वीरगति को प्राप्त हुई।

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दुर्गा भाभी

महान क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद के कहने पर ‘द फिलॉसफी ऑफ बम’ दस्तावेज बनाने वाले भवतीचरण वोहरा की पत्नी दुर्गा भाभी नाम से मशहूर थी। वह एक सक्रिय क्रांतिकारी रही। उन्होंने भगत सिंह को लाहौर से फरार कराने में अपनी अहम भूमिका निभाई थी। साल 1928 में जब अंग्रेजी अफसर सांडर्स को मौत के घाट उतारने के बाद भगत सिंह और राजगुरु लाहौर से कोलकाता के लिए निकल रहे थे, तब उनकी पहचान छुपाने के लिए दुर्गा भाभी भगत सिंह की पत्नी बनी और राजगुरु भगत सिंह के नौकर बने थे। लाहौर में साल 1927 में लाला लाजपत राय की मौत का बदला लेने की रणनीति तैयार करने के लिए दुर्गा भाभी ने एक बैठक की अध्यक्षता की थी। इसके बाद मुंबई के गवर्नर हेली को मारने के दौरान 11 अंग्रेजी अफसर घायल हो गया था। जिसे दुर्गा भाभी ने मारा था। इस मामले में दुर्गा भाभी के खिलाफ दो वारंट भी आए। 2 साल से अधिक फरार होने के बाद दुर्गा भाभी को 1931 में लाहौर में गिरफ्तार किया गया।

बेगम हजरत महल

अंग्रेजों ने अवध के नवाब वाजिद अली शाह को उनकी गद्दी से बेदखल कर डाला। लेकिन उनकी बेगम हजरत महल में ईस्ट इंडिया कंपनी की नाक में दम करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। हजरत ने चिनहट जंग के बाद 1857 को अपने 11 साल के बेटे बिरजिस कद्र को अवध का ताज पहनाया। इस लड़ाई का नतीजा यह रहा कि अंग्रेजों को लखनऊ रेजिडेंट में शरण लेने को मजबूर होना पड़ा। हजरत महल ने अपने बेटे की गद्दी के प्रतिनिधि के नाते 10 महीने तक अवध का राज काज संभाला था और अंग्रेजों से आखरी दम तक लड़ती रही। इसके बाद उन्हें नेपाल जाना पड़ा और वही साल 1879 में उनकी मौत हो गई।

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रानी चेनम्मा

रानी लक्ष्मीबाई से पहले कित्तूर की रानी चेनम्मा ने अंग्रेजों के दांत खट्टे करने में कसर नहीं छोड़ी थी। चेनम्मा को दक्षिण की लक्ष्मीबाई भी कहा जाता हैं। वह पहली भारतीय रानी थी जो अंग्रेजो के खिलाफ सशस्त्र मैदान में उतरी थी। उस समय अंग्रेजी सेना की तुलना में उनकी सैन्य शक्ति कम थी लेकिन हिम्मत और हौसले के मामले में वह ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी से बढ़कर थी। देसाई वंश के राजा मल्लासारजा से विवाह के बाद एक कित्तूर की रानी बनी। 1824 में बेटे की मौत उन्होंने एक बच्चे शिवलिंगप्पा को गोद लेकर अपना वारिस बनाया। रानी ने अपने साथियों के साथ मिलकर अंग्रेजों का जमकर मुकाबला किया। अंग्रेजों ने रानी को बेलहोंगल के किले में बंदी बनाया और यहां 21 फरवरी 1829 को रानी ने अंतिम सांस ली।

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