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EWS Reservation: EWS के आरक्षण पर क्या है सुप्रीम कोर्ट का बयान, जानें पूरी खबर

EWS Reservation: आपको बता दें, आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों को 10 प्रतिशत का आरक्षण प्रदान किया गया था। इसमें जो छात्र आर्थिक रूप से कमजोर हैं वो इस आरक्षण श्रेणी की मदद से शिक्षण संस्थान में दाखिला ले सकते हैं। मगर कुछ दिनों से मुद्दा सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से कहां है कि आर्थिक स्थिति अस्थाई मामला है इसका सकारात्मक ढंग से भी हल निकाला जा सकता है। इसमें सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि छात्रों को आरक्षण के बजाय छात्रवृति या प्रोत्साहन राशि प्रदान किया जा सकता है। इसमें आरक्षण कोई उचित निर्णय नहीं है। इस मामले पर एक रिपोर्ट सामने आया है कि पांच न्यायधीशों की संविधान पीठ की अध्यक्षता कर रहे भारत के मुख्य न्यायधीश जस्टिस यूयू ललित का कहना है कि, जो आरक्षण की प्रक्रिया शुरू से ही चलती आ रही है वो वंश से ही जुड़ा हुआ है। इसमें पिछड़ापन जैसी कोई भी चीज नहीं है। ये प्रथा सदियों से चलती आ रही है। वहीं ईडब्ल्यूएस आस्थायी समस्याओं के लिए बनाया गया है। इसमें आरक्षण देना उचित नहीं होगा। इसके लिए कोई और विकल्प निकाला जा सकता है।

केंद्र की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता

इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट के सवालों पर केंद्र के पक्ष से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता सामने आ रहे हैं। इन्होंने संविधान पीठ की टप्पणी पर कहा कि, संविधान में सामाजिक पिछड़ेपन को कही से भी परिभाषित नहीं किया गया है। इस पर जस्टिस भट का बयान सामने आया कि, इस चीज के लिए संविधान से परे, प्रस्तावना, संविधान निर्माताओं के भाषण आदि तक तय किया जा सकता है। उन्होंने बताया कि ईडब्ल्यूएस के मामले में आप एक अज्ञात समुद्र में हैं। इस पर जस्टिस माहेश्वरी का बयान सामने आया कि ईडब्ल्यूएस में कौन शामिल होगा। इस पर कोई पद्धति या दिशानिर्देश तय नहीं किया गया है।

इस पर सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता का कहना है कि, इस समस्या का समाधान आयोग का गठन कर लिया जा सकता है। इस समस्या का भी समाधान निकाला जा सकता है। इसके लिए सरकार कमीशन ला सकती है। इसके लिए कई सारे राज्य ईडब्ल्यूएस कोटा को लागू कर सकते हैं। मगर बिना दिशानिर्देश के संविधान संशोधन को चुनौती देना उचित नहीं होगा।

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मेहता ने कहा, जाति सामाजिक पिछड़ेपन का एक मात्र संकेतक नहीं है

मेहता ने अपने तर्क पर कहा कि, वित्तीय वास्तविकता में केवल गरीबी और आर्थिक कमजोरी ही शामिल नहीं होती है। आर्थिक कमजोर को सामाजिक वास्तविकता में शामिल किया जाता है। केवल जाति का पिछड़ा होना ही सामाजिक पिछड़ेपन का एकमात्र संकेतक नहीं है। सामाजिक पिछड़ापन के कई सारे कारण हो सकते हैं। जाति को इसमें शामिल करना उचित नहीं होगा। जाति एक वास्तविकता है।

संविधान पीठ पर मेहता का बयान

21वीं सदी में देश तरक्की के मार्ग पर चल रहा है। इसमें आर्थिक तंगी अपने आप में सामाजिक प्रतिष्ठा का सूचक बन गई है। इस स्थिति में जातियों और वर्गों में सुधार लाने में बहुत जरूरत है। इसके अलावा सामाजिक और आर्थिक और राजनीतिक जीवन में भी विकास लाना बहुत जरूरी है।

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