GLA University: जीएलए के प्रोफेसर्स की बड़ी उपलब्धि, जर्मनी में अविष्कार का पेटेंट हुआ ग्रांट

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GLA University: बेहतर रिसर्च की ओर जीएलए विश्वविद्यालय, मथुरा के कदम तेजी से बढ़ रहे हैं। यहां के प्रोफेसर्स द्वारा रिसर्च कर तैयार किए जा रहे प्रोटोटाइप विदेशों में भी पेटेंट पब्लिश और ग्रांट हो रहे हैं। हाल ही में मैकेनिकल इंजीनियरिंग विभाग के दो प्रोफेसर्स को बड़ी उपलब्धि हासिल हुई है। उनके ‘ट्रपेजोइडल प्लेट सोलर कलेक्टर‘ प्रोटोटाइप का इसी वर्ष जर्मनी में पेटेंट पब्लिश होकर ग्रांट हुआ है।

मैकेनिकल इंजीनियरिंग विभाग के दो प्रोफेसर एसोसिएट प्रोफेसर डाॅ. सुजीत कुमार वर्मा और असिस्टेंट प्रोफेसर हरीश कुमार शर्मा ने काफी लम्बे समय तक ‘ट्रपेजोइडल प्लेट सोलर कलेक्टर‘ नामक एक रिसर्च किया। इस पर रिसर्च करने के बाद प्रोटोटाइप का अविष्कार किया। यह प्रोटोटाइप अधिक संख्या में और कम समय में गर्म पानी उपलब्ध करायेगा। इसकी सबसे बड़ी खाशियत यह होगी यह सूर्य की किरण से संचालित होगा। इसमें विद्युत सप्लाई की जरूरत नहीं पडे़गी।

अक्सर देखा जाता है कि बड़ी-से-बड़ी इंडस्ट्रीज में अधिकतर सामान को तैयार करने के लिए अधिक मात्रा में गर्म पानी का प्रयोग किया जाता है। जिसके लिए वह कई गीजर और फ्लेट प्लेट सोलर कलेक्टर का प्रयोग करते हैं। दोनों ही प्रोफेसर्स ने दावा करते हुए कहा है कि वर्तमान में अधिक संख्या में पानी को गर्म करने वाला फ्लेट प्लेट सोलर कलेक्टर अधिक समय में भी कम मात्रा में पानी गर्म करता है।

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उन्होंने इसका कारण बताते हुए कहा कि ट्यूब के एक हिस्से हीट करने वाली प्लेट जुड़ी हुई है। इस वजह से भी ट्यूब में पानी गर्म होने पर काफी समय लगता है। उनके द्वारा जो अब ‘ट्रपेजोइडल प्लेट सोलर कलेक्टर‘ का अविश्कार हुआ है उस ट्यूब की अधिकतर दिशाएं सोलर प्लेट से जुड़ी हुई हैं। इस कारण हीट ट्रांसफर अधिक मात्रा में होगा और गर्म पानी भी ज्यादा और जल्द होगा।

एसोसिएट प्रोफेसर डाॅ. सुजीत कुमार वर्मा ने बताया कि इस डिजाइन को टेस्ट करने के लिए सोलर सिम्युलेटर मशीन पर अलग-अलग वातावरण के अनुसार निरंतर प्रयोगों द्वारा पास किया गया है। इसके अतिरक्ति सिस्टम को अनुकूलित करने के लिए ऑपरेटिंग मापदंडों – ऊर्जा दक्षता, द्रव्यमान प्रवाह दर, सौर विकिरण एवं तापमान की भिन्नता के साथ डिजाइन विकसित किया गया है। यह डिजाइन घरों में भी इस्तेमाल किया जा सकता है। बाजार में आने के बाद इसकी कीमत करीब 20 हजार रुपये होगी। उन्होंने बताया कि जर्मनी पेटेंट कार्यालय द्वारा संपूर्ण मापन के बाद रिसर्च का पेटेंट पब्लिश हुआ। पब्लिश होने के बाद इसका प्रोटोटाइप का अविष्कार हुआ। इसके बाद र्जमनी में ही पेटेंट ग्रांट हुआ है।

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डीन रिसर्च प्रो. कमल शर्मा एवं विभागाध्यक्ष प्रो. पीयूष सिंघल ने इस बड़ी उपलब्धि पर कहा कि जर्मनी पेटेंट पब्लिश होकर ग्रांट होना विश्वविद्यालय के लिए बड़ी उपलब्धि तो ही वहीं, बल्कि प्रोफेसर्स के लिए बड़े गर्व की बात है। जिस प्रकार प्रोफेसर्स ने काफी लंबे समय बाद अन्तर्राष्ट्री स्तर पर सफलता हासिल की। ऐसे ही रिसर्च के बारे में मैकेनिकल विभाग के विद्यार्थियों को प्रेरित किया जाता है। इस रिसर्च में भी विद्यार्थियों ने बहुत जानकारी हासिल की है।

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