Chabahar Port: ईरान में जारी हिंसा के बीच कांग्रेस ने एक ऐसा ट्वीट किया, जिसने देश में हलचल मचा दी है। दरअसल कांग्रेस ने चाबहार पोर्ट पर एक ट्वीट किया और मोदी सरकार पर गंभीर आरोप लगाया था। हालांकि इस मामले पर विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने इस मामले पर अपनी प्रतिक्रिया दी है। गौरतलब है कि चाबहार पोर्ट पर लगी अमेरिकी पाबंदियों की छूट से रियायत की मियाद 26 अप्रैल, 2026 को खत्म हो रही है। इसी को लेकर अब रणधीर जयसवाल ने इस मामले पर अहम जानकारी दी है। आईए समझते है इसके मायने।
Chabahar Port को लेकर कांग्रेस ने लगाया गंभीर आरोप
चाबहार पोर्ट को लेकर कांग्रेस ने बीते दिन एक ट्वीट किया, जिसमे लिखा गया था कि नरेंद्र मोदी ने एकबार फिर ट्रंप के आगे सरेंडर कर दिया है। ख़बरों के मुताबिक- ट्रंप के दबाव में नरेंद्र मोदी ने ईरान के चाबहार पोर्ट से अपना कंट्रोल छोड़ दिया है, चुपके से वेबसाइट भी बंद करवा दी। इस बेहद महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट में मोदी सरकार ने देश की जनता के 120 मिलियन डॉलर लगाए थे और अब ये सब स्वाहा हैं।
जब चाबहार पोर्ट का एग्रीमेंट हुआ था तो नरेंद्र मोदी ने कहा था कि इकोनॉमी से जुड़ा बहुत बड़ा काम हुआ है। ये मेरी बहुत बड़ी सफलता है। अब जब चाबहार पोर्ट का कंट्रोल छोड़ दिया है तो इसपर कुछ नहीं बोल रहे हैं। चाबहार कोई आम बंदरगाह नहीं है। यह भारत को अफगानिस्तान और सेंट्रल एशिया से एक अहम और सीधा समुद्री रास्ता देता है, जिससे हम पाकिस्तान को बाईपास कर सकते हैं और चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव का मुकाबला भी कर सकते हैं।
कांग्रेस के आरोपों पर मोदी सरकार का करारा जवाब
चाबहार बंदरगाह के मुद्दे पर विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि “जैसा कि आप जानते हैं, 28 अक्टूबर 2025 को अमेरिकी वित्त विभाग ने एक पत्र जारी किया था। उस पत्र में हमें बिना शर्त प्रतिबंध माफी के बारे में सूचित किया गया था।
जैसा कि आप जानते हैं, हमें मिली प्रतिबंध माफी 26 अप्रैल 2026 तक वैध है। हम इस ढांचे के भीतर काम करने के लिए अमेरिकी पक्ष के साथ बातचीत कर रहे हैं।” अमेरिका और अन्य देशों में भारत के राजदूत अमेरिकी कांग्रेस के सदस्यों और वहां के समाज के अन्य वर्गों के लोगों के साथ निरंतर संवाद में रहते हैं।
चाबहार बंदरगाह से बाहर निकलना भारत के लिए कितना नुकसानदायक
मालूम हो कि चाबहार बंदरगाह पर भारत की कोई भौतिक संपत्ति नहीं होने का मतलब है कि मानव संसाधन लागत के अलावा कोई नुकसान नहीं होगा। इससे भारत आर्मेनिया के मार्गों या ओमान के दुक्म बंदरगाह जैसे संभावित विकल्पों की ओर रुख कर सकेगा। यह वास्तव में “बहु-संरेखण” की परिपक्वता को रेखांकित करता है। यानि अगर भारत इससे बाहर निकलता है तो भी भारत को ज्यादा नुकसान होने की उम्मीद कम है।






