Uniform Civil Code पर सुप्रीम कोर्ट का नरम रुख! शरिया को लेकर दाखिल याचिका पर सुनवाई में की अहम टिप्पणी, क्या साफ होगा रास्ता?

Uniform Civil Code को लेकर सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी सामने आई है। मंगलवार को शरिया कानून के खिलाफ दाखिल याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस सूर्यकांत की बेंच ने यूसीसी पर सुझाव दिया है।

Uniform Civil Code

Picture Credit: गूगल (सांकेतिक तस्वीर)

Uniform Civil Code: बहुचर्चित समान नागरिक संहिता को लेकर एक बार फिर सुर्खियों का दौर शुरू है। इसका एक सिरा सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी से जुड़ा है। दरअसल, सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच ने मंगलवार को शरिया पर दाखिल याचिका की सुनवाई करते हुए अहम टिप्पणी की है। कोर्ट की ओर से कहा गया कि यूनिफॉर्म सिविल कोड यानी समान नागरिक संहिता लागू करने का समय आ गया है।

जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस आर महादेवन की बेंच द्वारा की गई टिप्पणी के बाद कई सवाल उठ रहे हैं। पूछा जा रहा है कि क्या यूनिफॉर्म सिविल कोड यानी यूसीसी लागू करने का रास्ता साफ हो सकता है? आइए इसका जवाब तलाशने के साथ यूसीसी पर उच्चतम न्यायालय के नरम रुख की चर्चा करते हैं।

सुप्रीम कोर्ट का Uniform Civil Code पर नरम रुख!

चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच का यूनिफॉर्म सिविल कोड को लेकर नरम रुख सामने आया है। बेंच ने मंगलवार को एक सुनवाई के दौरान कहा कि समान नागरिक संहिता लागू करने का सही समय आ गया है। कोर्ट ने अहम टिप्पणी कर कहा कि सभी धर्मों की महिलाओं को न्याय दिलाने के लिए एक समान कानून की जरूरत महसूस की जा सकती है। इस पर विधायिका को विचार करना चाहिए।

कोर्ट का ये रुख चर्चाओं में है। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया है कि अगर पर्सनल लॉ (शरिया) महिलाओं को संविधान के तहत मिलने वाले उनके बुनियादी अधिकारों से दूर रखते हैं, तो ऐसे में यूनिफॉर्म सिविल कोड पर विचार करना जरूरी हो जाता है। हालांकि, पीठ ने ये भी कहा कि अगर 1937 का यह कानून (मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एक्ट) पूरी तरह हटा दिया जाता है, तो इससे एक कानूनी खालीपन पैदा हो सकता है।

सनद रहे कि कोर्ट की ये टिप्पणी 1937 के शरिया कानून के प्रावधानों को मुस्लिम महिलाओं के साथ भेदभावपूर्ण बताते हुए निरस्त करने के अनुरोध वाली याचिका पर सामने आई है।

क्या साफ होगा यूसीसी लागू करने का रास्ता?

इस सवाल का जवाब भविष्य के गर्भ में है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि यूसीसी लागू करना या ना करना विधायिका (सरकार) के विवेक पर निर्भर करता है। जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने यूसीसी को व्यक्तिगत कानूनों में लैंगिक भेदभाव को दूर करने का एक तरीका भी सुझाया है। ऐसे में देखना दिलचस्प होगा कि निकट भविष्य में केन्द्र की बीजेपी सरकार अपने पुराने चुनावी वादे को पूरा करती है या नहीं।

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