Vande Mataram: कश्मीर से कन्याकुमारी तक राष्ट्रीय गीत को लेकर जारी नए निर्देश सुर्खियों में हैं। इन्हीं निर्देशों का जिक्र कर जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष अरशद मदनी ने तल्ख प्रतिक्रिया दी है। भारत के सबसे बड़े मुस्लिम संगठन के मुखिया ने कई बातें कही हैं। उन्होंने साफ तौर पर कहा कि वंदे मातरम पर सरकार के नए निर्देश संविधान में दी गई धार्मिक स्वतंत्रता पर हमला है।
मौलाना मदनी ने दोहराया है कि मुसलमान केवल अल्लाह की इबादत करता है। ऐसे में वंदे मातरम की वो पंक्तियां जो बहुदेववादी आस्था पर आधारित हैं, वे मुसलमानों के लिए उपयुक्त नही हैं। मौलाना मदनी ने और भी कई पहलुओं का जिक्र किया है जिसको लेकर नए सिरे से घमासान मचा है।
केन्द्र सरकार के नए निर्देशों के बाद मौलाना मदनी की पहली प्रतिक्रिया!
बीते कल की ही बात है जब केन्द्र सरकार ने वंदे मातरम के सभी छह छंद को अनिवार्य कर दिया। इसको लेकर देश के सियासी गलियारों में भी उठा-पटक का दौर जारी है।
“वंदे मातरम्” को राष्ट्रीय गीत के रूप में सभी सरकारी कार्यक्रमों, स्कूलों, कॉलेजों और आयोजनों में इसकी समस्त पंक्तियों को अनिवार्य करना केंद्र सरकार का न केवल एक पक्षपाती और ज़बरदस्ती थोपा गया फैसला है, बल्कि यह संविधान में दी गई धार्मिक स्वतंत्रता पर खुला हमला और अल्पसंख्यकों के…
— Arshad Madani (@ArshadMadani007) February 12, 2026
मौलाना अरशद मदनी ने वंदे मातरम को लेकर जारी नए निर्देशों का जिक्र कर इसे धार्मिक स्वतंत्रता पर हमला बताया है। मौलाना मदनी लिखते हैं कि “वंदे मातरम को राष्ट्रीय गीत के रूप में सभी सरकारी कार्यक्रमों, स्कूलों, कॉलेजों और आयोजनों में इसकी समस्त पंक्तियों को अनिवार्य करना केंद्र सरकार का न केवल एक पक्षपाती और जबरदस्ती थोपा गया फैसला है, बल्कि यह संविधान में दी गई धार्मिक स्वतंत्रता पर खुला हमला और अल्पसंख्यकों के अधिकार छीनने का निंदनीय प्रयास है। मुसलमान किसी को वंदे मातरम् पढ़ने या उसकी धुन बजाने से नहीं रोकते, मगर क्योंकि उसकी कुछ पंक्तियाँ बहुदेववादी आस्था पर आधारित हैं। इसलिए मुसलमान, जो केवल अल्लाह की वंदना करता है, उसको इसे पढ़ने पर विवश करना संविधान की धारा 25 का उल्लंघन है।”
अरशद मदनी आगे लिखते हैं कि “मुसलमान केवल एक अल्लाह की इबादत करता है। हम सब कुछ बर्दाश्त कर सकते हैं, मगर अल्लाह के साथ किसी को शरीक करना कभी स्वीकार नहीं कर सकते। इसलिए वंदे मातरम् को अनिवार्य कर देना संविधान की आत्मा, धार्मिक स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक मूल्यों पर खुला हमला है।” जमीयत उलेमा-ए-हिंद चीफ की इस प्रतिक्रिया को लेकर संग्राम छिड़ा है।
राष्ट्रीय गीत Vande Mataram पर नए निर्देशों को लेकर संग्राम!
देश के विभिन्न हिस्सों में तमाम मुस्लिम संगठन केन्द्र सरकार के उस फैसले का विरोध कर रहे हैं जिसमें वंदे मातरम को अनिवार्य करने का जिक्र है। जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अलावा कई छोटे-बड़े मुस्लिम संगठन वंदे मातरम को अनिवार्य करने वाले फैसले के खिलाफ हैं। नई दिल्ली से कश्मीर तक प्रतिक्रियाओं का दौर जारी है।
हालांकि, सरकार ने साफ कर दिया है कि ये फैसला राष्ट्रीय गीत की रचना के 150वें वर्ष में सम्मान भाव के साथ लिया गया है। इसका उद्देश्य किसी की भावनाओं को आहत करना नहीं, बल्कि राष्ट्रीय गीत के प्रति आस्था और सम्मान प्रकट करना है। अब देखना दिलचस्प होगा कि इस प्रकरण में आगे क्या होता है।
