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नवरात्रि महापर्व : शक्ति-तत्त्व, आत्मबोध और ब्रह्मविद्या का सनातन रहस्य

Navratri Mahaparv: नवरात्रि का आध्यात्मिक महत्त्व शक्ति-उपासना, धर्म की प्रतिष्ठा, आसुरी प्रवृत्तियों के निराकरण तथा आत्मविवेक के जागरण में निहित है। जब मनुष्य इस पर्व को केवल बाह्य अनुष्ठान तक सीमित न रखकर उसके दार्शनिक रहस्य को समझता है, तब नवरात्रि उसके लिए उत्सव मात्र न रहकर आत्मपरिवर्तन का अवसर बन जाती है।

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By: Anjali Wala

Published: अक्टूबर 11, 2026 5:27 अपराह्न

Navratri Mahaparv
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Navratri Mahaparv: नवरात्रि केवल देवी-पूजन का पर्व नहीं, अपितु शक्ति के स्वरूप को समझने, अंतःकरण को परिष्कृत करने और जीवन को धर्ममय बनाने की सनातन साधना है। यह पर्व मनुष्य को बाह्य जगत् की चकाचौंध से हटाकर अपने अंतर्जगत् में प्रवेश करने की प्रेरणा देता है। इसका मर्म केवल दीप प्रज्वलित करना नहीं, अपने भीतर के अज्ञान को मिटाना है; केवल देवी के सम्मुख नतमस्तक होना नहीं, अपने अहंकार को झुकाना है; केवल व्रत धारण करना नहीं, अपने विचार, वाणी और आचरण को पवित्र बनाना है।

शास्त्रों की दृष्टि से नवरात्रि का आध्यात्मिक महत्त्व शक्ति-उपासना, धर्म की प्रतिष्ठा, आसुरी प्रवृत्तियों के निराकरण तथा आत्मविवेक के जागरण में निहित है। जब मनुष्य इस पर्व को केवल बाह्य अनुष्ठान तक सीमित न रखकर उसके दार्शनिक रहस्य को समझता है, तब नवरात्रि उसके लिए उत्सव मात्र न रहकर आत्मपरिवर्तन का अवसर बन जाती है।

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१. शक्ति क्या है? वेदों में देवी-तत्त्व का स्वरूप

सनातन दर्शन में शक्ति को केवल शारीरिक बल अथवा भौतिक सामर्थ्य नहीं माना गया है। शक्ति सृष्टि की अभिव्यक्ति, जीवन की क्रियाशीलता, ज्ञान की प्रकाशिका तथा धर्म की रक्षिका के रूप में भी प्रतिष्ठित है।

ऋग्वेद के देवी सूक्त में वाक् ऋषिका कहती हैं—

अहं रुद्रेभिर्वसुभिश्चराम्यहमादित्यैरुत विश्वदेवैः।
अहं मित्रावरुणोभा बिभर्म्यहमिन्द्राग्नी अहमश्विनोभा॥

— ऋग्वेद १०.१२५.१

भावार्थ: देवी सूक्त में वाक्-अम्भृणी समस्त देवशक्तियों के साथ अपनी व्यापक सत्ता का उद्घोष करती हैं। यह सूक्त शक्ति की व्यापकता तथा सृष्टि के विविध आयामों में उसकी अभिव्यक्ति का वैदिक प्रतिपादन करता है।

यहाँ विशेष रूप से समझना चाहिए कि वैदिक देवी सूक्त में वर्णित वाक्-तत्त्व और पुराणों में वर्णित दुर्गा के स्वरूपों को बिना किसी भेद के एक ही कथात्मक रूप नहीं मान लेना चाहिए। दोनों के बीच शक्ति की व्यापक अवधारणा का दार्शनिक संबंध अवश्य देखा जा सकता है।

श्वेताश्वतरोपनिषद् में परमात्मा की शक्ति के विषय में कहा गया है—

परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते
स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च॥

— श्वेताश्वतरोपनिषद् ६.८

भावार्थ: परम सत्ता की शक्तियाँ अनेक प्रकार से अभिव्यक्त होती हैं। ज्ञान, बल और क्रिया उसकी स्वाभाविक शक्तियों के रूप में वर्णित हैं।

इस मंत्र से शक्ति के तीन महत्त्वपूर्ण आयामों को समझने की प्रेरणा मिलती है—

ज्ञानशक्ति — सत्य को जानने और विवेकपूर्वक निर्णय करने की सामर्थ्य।

बलशक्ति — धर्म के मार्ग पर स्थिर रहने का आंतरिक सामर्थ्य।

क्रियाशक्ति — ज्ञान और संकल्प को श्रेष्ठ कर्म में परिणत करने की क्षमता।

यह तीनों शब्दों का आध्यात्मिक अनुप्रयोग है, मंत्र का शाब्दिक अनुवाद नहीं।

अतः नवरात्रि का एक गहन संदेश यह है कि मनुष्य केवल सामर्थ्यवान न बने, विवेकवान भी बने; केवल ज्ञानी न बने, अपने ज्ञान को सदाचार में भी परिणत करे।

जहाँ ज्ञान है, किंतु आचरण नहीं, वहाँ साधना अधूरी है; जहाँ शक्ति है, किंतु विवेक नहीं, वहाँ शक्ति का दुरुपयोग संभव है।

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२. देवीमाहात्म्य : धर्म की विजय और शक्ति की प्रतिष्ठा

मार्कण्डेयपुराण में वर्णित देवीमाहात्म्य, जिसे दुर्गासप्तशती अथवा चण्डीपाठ भी कहा जाता है, देवी-उपासना का अत्यंत महत्त्वपूर्ण ग्रंथ है। इसके तेरह अध्यायों में देवी की महिमा तथा मधु-कैटभ, महिषासुर और शुम्भ-निशुम्भ आदि से संबंधित आख्यान वर्णित हैं।

देवीमाहात्म्य में देवी का प्रसिद्ध स्तवन है—

या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

भावार्थ: जो देवी समस्त प्राणियों में शक्ति के रूप में प्रतिष्ठित हैं, उन्हें बारंबार प्रणाम है।

इस स्तुति का मर्म केवल देवी की महिमा का गान नहीं, बल्कि शक्ति के प्रति श्रद्धा और उसके सदुपयोग की प्रेरणा भी है।

यदि शक्ति के प्रति हमारी श्रद्धा वास्तविक है, तो हमें जीवन में दुर्बल की रक्षा, पीड़ित के प्रति करुणा, नारी के प्रति सम्मान और अन्याय के विरुद्ध धर्मसम्मत आचरण को भी महत्त्व देना चाहिए।

देवी की आराधना का अर्थ यह नहीं कि हम केवल मंदिर में शक्ति का स्मरण करें और संसार में दुर्बल के प्रति कठोर बने रहें। उपासना की सार्थकता तभी है, जब उसका प्रभाव हमारे व्यवहार में दिखाई दे।

देवी की प्रतिमा के सम्मुख किया गया प्रणाम भक्ति है; उसी देवी के नाम पर किसी पीड़ित की सहायता करना भक्ति की व्यावहारिक अभिव्यक्ति है।

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३. महिषासुर-वध का आध्यात्मिक संकेत

देवीमाहात्म्य में महिषासुर का वध देवी की विजय के रूप में वर्णित है। यह पुराण का धार्मिक आख्यान है। इसके अतिरिक्त, साधना की दृष्टि से इससे एक नैतिक और आध्यात्मिक संकेत भी ग्रहण किया जा सकता है।

मनुष्य के अंतःकरण में काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, अहंकार और अविवेक जैसी प्रवृत्तियाँ उसके विवेक को आच्छादित कर सकती हैं। जब ये प्रवृत्तियाँ मनुष्य के विचार और आचरण पर अधिकार कर लेती हैं, तब वह जानते हुए भी अनुचित कर्म करने लगता है।

इस आंतरिक संघर्ष में विवेक, संयम, सत्यनिष्ठा और आत्मनिरीक्षण ही उसके वास्तविक सहायक बनते हैं।

यहाँ महिषासुर को आंतरिक दुर्गुणों का प्रतीक मानना एक आध्यात्मिक व्याख्या है, देवीमाहात्म्य के मूल आख्यान का विकल्प नहीं।

भगवद्गीता में श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं—

त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः।
कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्॥

— श्रीमद्भगवद्गीता १६.२१

भावार्थ: काम, क्रोध और लोभ—ये तीन आत्मविनाश के द्वार हैं; इसलिए मनुष्य को इनसे बचने का प्रयत्न करना चाहिए।

इस श्लोक का नवरात्रि की साधना से गहरा व्यावहारिक संबंध है। यदि हम देवी के सम्मुख खड़े होकर अपनी इच्छाओं, क्रोध और लोभ की समीक्षा नहीं करते, तो उपासना का एक महत्त्वपूर्ण आंतरिक पक्ष छूट जाता है।

नवरात्रि का वास्तविक आत्मपरीक्षण यह है कि हम दूसरों के दोष देखने से पहले अपने अंतःकरण की दुर्बलताओं को पहचानें।

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४. नवदुर्गा : उपासना, अनुशासन और आत्मपरिष्कार

नवरात्रि में माँ दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा की जाती है। इन स्वरूपों का अपना धार्मिक और पौराणिक महत्त्व है। साधना की दृष्टि से इनसे जीवन के लिए अनेक प्रेरणाएँ भी ग्रहण की जा सकती हैं।

१. माँ शैलपुत्री — स्थिरता का संदेश

पर्वतराज हिमालय की पुत्री के रूप में पूजित माँ शैलपुत्री साधक को धैर्य, स्थिरता और दृढ़ संकल्प की प्रेरणा देती हैं। आध्यात्मिक मार्ग पर चलने के लिए चंचलता नहीं, निरंतरता आवश्यक है।

२. माँ ब्रह्मचारिणी — तप और संयम

साधना केवल भावुकता से पूर्ण नहीं होती। उसके लिए अनुशासन, धैर्य और इंद्रियसंयम आवश्यक हैं। ब्रह्मचारिणी का स्वरूप साधक को अपने लक्ष्य के प्रति निष्ठावान रहने की प्रेरणा देता है।

३. माँ चंद्रघंटा — साहस और सजगता

धर्म का मार्ग कभी-कभी कठिन परिस्थितियों से होकर गुजरता है। ऐसे समय में भय के वशीभूत होने के स्थान पर विवेकपूर्वक कर्तव्य का निर्वाह करना चाहिए।

४. माँ कूष्माण्डा — सृजनात्मक शक्ति

जीवन में सकारात्मकता, उत्साह और सृजनशीलता भी शक्ति की महत्त्वपूर्ण अभिव्यक्तियाँ हैं। अपनी सामर्थ्य का उपयोग निर्माण, सेवा और लोककल्याण में करना साधना का व्यावहारिक पक्ष है।

५. माँ स्कंदमाता — करुणा और संरक्षण

ममता, करुणा और संरक्षण का भाव मनुष्य के हृदय को संवेदनशील बनाता है। जहाँ करुणा नहीं, वहाँ धर्म का आचरण भी कठोर और यांत्रिक हो सकता है।

६. माँ कात्यायनी — कर्तव्यनिष्ठा

अन्याय के सामने निष्क्रिय बने रहना उचित नहीं। धर्मसम्मत साहस, कर्तव्यपालन और न्याय के प्रति निष्ठा जीवन को सार्थक बनाते हैं।

७. माँ कालरात्रि — भय का अतिक्रमण

साधक को अपने भय, भ्रम और अज्ञान का सामना करना चाहिए। सत्य से भागने के स्थान पर सत्य को स्वीकार करना आत्मविकास की आवश्यक शर्त है।

८. माँ महागौरी — पवित्रता और निर्मलता

अंतःकरण की शुद्धि केवल बाहरी आडंबर से नहीं आती। विचारों की पवित्रता, वाणी की मधुरता और कर्मों की निष्कपटता से जीवन में निर्मलता आती है।

९. माँ सिद्धिदात्री — साधना की परिपक्वता

साधना का उद्देश्य केवल किसी विशेष उपलब्धि की प्राप्ति नहीं, बल्कि विवेक, विनम्रता और आध्यात्मिक परिपक्वता का विकास भी है।

ये नौ बिंदु नवदुर्गा के पारंपरिक स्वरूपों से ग्रहण की गई साधनामूलक प्रेरणाएँ हैं। इन्हें किसी एक शास्त्र में निर्धारित नौ मनोवैज्ञानिक अवस्थाओं के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा।

नवदुर्गा की उपासना तभी अधिक सार्थक बनती है, जब श्रद्धा के साथ जीवन में धैर्य, संयम, साहस, करुणा, पवित्रता और विनम्रता का भी विकास हो।

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५. उपवास का रहस्य : केवल अन्नत्याग नहीं, आत्मनिरीक्षण भी

उपवास को प्रायः भोजन के त्याग के रूप में समझा जाता है। धार्मिक परंपराओं में इसका विशेष महत्त्व है; किंतु नवरात्रि के आध्यात्मिक संदर्भ में संयम, प्रार्थना, जप, स्वाध्याय और आत्मनिरीक्षण भी अत्यंत उपयोगी हैं।

यदि कोई व्यक्ति अन्न का त्याग करता है, किंतु वाणी से दूसरों को पीड़ा पहुँचाता है, क्रोध को पोषित करता है और व्यवहार में छल करता है, तो उसे अपने व्रत के आंतरिक उद्देश्य पर विचार करना चाहिए।

उपवास की आध्यात्मिक भावना को इस प्रकार समझा जा सकता है—

आहार में यथाशक्ति संयम।

वाणी में सत्य और मधुरता।

विचारों में पवित्रता।

व्यवहार में करुणा।

कर्मों में धर्मनिष्ठा।

मन में ईश्वर के प्रति श्रद्धा।

इनमें से प्रत्येक गुण साधना को बाह्य अनुष्ठान से आगे ले जाकर जीवन के आचरण से जोड़ता है।

यह भी ध्यान रखना चाहिए कि व्रत शरीर को अनावश्यक कष्ट देने का साधन नहीं है। अपनी आयु, स्वास्थ्य और शारीरिक आवश्यकताओं के अनुसार ही उपवास करना उचित है।

जिस व्रत से मन में संयम और जीवन में सदाचार बढ़े, वही व्रत अपने आध्यात्मिक उद्देश्य की ओर अग्रसर करता है।

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६. शक्ति-उपासना और आत्मज्ञान का संबंध

शक्ति-उपासना और आत्मज्ञान के विषय में एक महत्त्वपूर्ण दार्शनिक भेद समझना आवश्यक है।

भक्ति की दृष्टि से साधक देवी को अपनी आराध्या, माता और जगज्जननी मानकर उनकी कृपा की प्रार्थना करता है। उपनिषदों और वेदान्त की दृष्टि से साधक ब्रह्म, आत्मा और जगत् के वास्तविक संबंध का विचार करता है।

इन दोनों दृष्टियों का साधना में अपना-अपना स्थान है; किंतु उनके सिद्धांतों को बिना विवेक के एक ही कथन में मिला देना उचित नहीं।

बृहदारण्यक उपनिषद् में कहा गया है—

आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः।

— बृहदारण्यक उपनिषद् २.४.५

भावार्थ: आत्मा को जानने के लिए उसका श्रवण, मनन और निदिध्यासन करना चाहिए।

यह उपनिषद्-वाक्य आत्मज्ञान की साधना में केवल सुन लेने को पर्याप्त नहीं मानता। श्रवण के पश्चात् विषय पर विचार करना और फिर उस सत्य का गहन चिंतन करना भी आवश्यक है।

नवरात्रि के समय साधक देवी-पूजन के साथ स्वाध्याय, मंत्रजप, ध्यान और आत्मनिरीक्षण कर सकता है। इससे उसकी धार्मिक साधना में गहराई आती है।

वेदान्त की दृष्टि से आत्मज्ञान का उद्देश्य किसी नवीन वस्तु को प्राप्त करना मात्र नहीं, बल्कि अपने वास्तविक स्वरूप के संबंध में विद्यमान अज्ञान का निराकरण करना है।

इसलिए यह कहना अधिक उचित है कि देवी-उपासना साधक को श्रद्धा, समर्पण और अंतःकरण की शुद्धि की ओर प्रेरित कर सकती है, जबकि आत्मतत्त्व का निर्णय शास्त्रसम्मत श्रवण, मनन और निदिध्यासन से किया जाता है।

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७. नारी-सम्मान और देवी-उपासना

देवी को शक्ति, करुणा, मातृत्व और संरक्षण के रूप में पूजने वाली परंपरा हमें नारी के सम्मान पर भी विचार करने की प्रेरणा देती है।

किसी पर्व का धार्मिक महत्त्व तभी व्यापक सामाजिक अर्थ ग्रहण करता है, जब उसके आदर्श व्यवहार में भी दिखाई दें।

यदि हम देवी की आराधना करते हैं, तो अपने परिवार, समाज और कार्यक्षेत्र में महिलाओं के प्रति सम्मानपूर्ण व्यवहार, उनकी गरिमा की रक्षा तथा उनके अधिकारों के प्रति सजगता को भी महत्त्व देना चाहिए।

कन्यापूजन की परंपरा श्रद्धा और पवित्रता का भाव जगाती है। इस भाव की सार्थकता तभी बढ़ती है, जब बालिकाओं की शिक्षा, सुरक्षा, स्वास्थ्य और सम्मान को भी जीवन में प्राथमिकता दी जाए।

यहाँ किसी धार्मिक अनुष्ठान को सामाजिक सदाचार का विकल्प नहीं, बल्कि उसके लिए प्रेरणा के रूप में देखना चाहिए।

देवी की उपासना का एक व्यावहारिक संदेश यह भी है कि श्रद्धा केवल पूजा में नहीं, व्यवहार में भी प्रकट हो।

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८. नवरात्रि का समन्वित संदेश : धर्म, विवेक और लोककल्याण

वेदों का चिंतन, उपनिषदों का आत्मविचार, भगवद्गीता का कर्मयोग और देवीमाहात्म्य की शक्ति-उपासना—इन सबका अध्ययन मनुष्य को धर्मपूर्ण जीवन के विभिन्न आयामों पर विचार करने का अवसर देता है।

इन ग्रंथों की शिक्षाओं को नवरात्रि के संदर्भ में समझते हुए साधक अपने जीवन में निम्नलिखित संकल्प धारण कर सकता है—

प्रथम संकल्प — सत्य का पालन।
परिस्थितियाँ कठिन हों, तब भी यथाशक्ति सत्यनिष्ठ बने रहना।

द्वितीय संकल्प — आत्मसंयम।
इंद्रियों, वाणी और आवेगों को विवेकपूर्वक नियंत्रित करना।

तृतीय संकल्प — करुणा।
दूसरों के दुःख को समझना और यथाशक्ति सहायता करना।

चतुर्थ संकल्प — अहंकार का परिष्कार।
ज्ञान, पद, धन और सामर्थ्य को श्रेष्ठता के अहंकार का कारण न बनने देना।

पंचम संकल्प — धर्मसम्मत कर्म।
अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से निर्वाह करना और अन्याय से यथाशक्ति दूर रहना।

षष्ठ संकल्प — आत्मचिंतन।
प्रतिदिन अपने विचारों और कर्मों की समीक्षा करना तथा अपनी त्रुटियों को सुधारने का प्रयत्न करना।

ये संकल्प नवरात्रि की परंपराओं से प्रेरित व्यावहारिक साधना के सूत्र हैं, किसी एक शास्त्र के उद्धृत नियमों की सूची नहीं।

जब पूजा से श्रद्धा, श्रद्धा से संयम, संयम से सदाचार और सदाचार से अंतःकरण की निर्मलता उत्पन्न होती है, तब धार्मिक साधना का प्रभाव जीवन में स्पष्ट दिखाई देने लगता है।

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॥ उपसंहार : देवी की आराधना से अंतःकरण के प्रकाश तक ॥

नवरात्रि का परम संदेश केवल शक्ति की स्तुति करना नहीं, बल्कि शक्ति के स्वरूप, उसके सदुपयोग और धर्ममय जीवन के महत्त्व को समझना भी है।

मंदिर में दीप प्रज्वलित करना पूजा है, किंतु अपने आचरण से किसी के जीवन में आशा का प्रकाश उत्पन्न करना भी साधना है।

देवी के सम्मुख शीश झुकाना भक्ति है, किंतु अपने अहंकार को पहचानकर उसका परिष्कार करना भी आध्यात्मिक पुरुषार्थ है।

उपवास धारण करना धार्मिक अनुशासन है, किंतु लोभ, क्रोध और कटुता पर संयम प्राप्त करना भी अंतःकरण की साधना है।

देवी से शक्ति की प्रार्थना करना श्रद्धा है, किंतु उस शक्ति का उपयोग सत्य, न्याय, करुणा और लोककल्याण के लिए करना जीवन की श्रेष्ठ साधना है।

नवरात्रि हमें यह अवसर देती है कि हम अपने जीवन की दिशा पर पुनर्विचार करें। हम देखें कि हमारे भीतर कौन-सी प्रवृत्तियाँ विवेक को दुर्बल करती हैं, कौन-से विचार शांति को नष्ट करते हैं और कौन-से कर्म हमें धर्म से दूर ले जाते हैं।

इसके साथ ही हमें यह भी समझना चाहिए कि आत्मज्ञान का मार्ग केवल बाहरी उपलब्धियों का मार्ग नहीं है। वह सत्य को समझने, भ्रम का निराकरण करने, अपने कर्तव्यों का निर्वाह करने और अंतःकरण को निर्मल बनाने का मार्ग है।

वेदों का शक्ति-विषयक चिंतन, उपनिषदों का आत्मविचार, भगवद्गीता का धर्म और कर्म का उपदेश तथा देवीमाहात्म्य की उपासना-परंपरा—इनका गंभीर अध्ययन साधक को अपने जीवन में श्रद्धा और विवेक का संतुलन स्थापित करने की प्रेरणा देता है।

अतः इस पावन नवरात्रि में हम केवल देवी के नौ स्वरूपों का पूजन न करें, बल्कि अपने भीतर सद्गुणों का विकास करने का संकल्प भी लें। हमारी श्रद्धा में विवेक हो, हमारे ज्ञान में विनम्रता हो, हमारी शक्ति में करुणा हो और हमारे कर्मों में धर्म की प्रतिष्ठा हो।

यही नवरात्रि की साधना का सार है—शक्ति के प्रति श्रद्धा, अंतःकरण का परिष्कार, धर्म के प्रति निष्ठा और आत्मतत्त्व के ज्ञान की दिशा में सतत प्रयत्न।

माँ दुर्गा हम सबको सद्बुद्धि, आत्मबल, विवेक, करुणा और धर्ममय जीवन की प्रेरणा प्रदान करें।

॥ जय जगज्जननी माँ दुर्गा ॥ ॥ जय माँ आदिशक्ति ॥ ॥ सर्वे भवन्तु सुखिनः। सर्वे सन्तु निरामयाः। ॥

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शास्त्रीय आधार एवं संदर्भ

इस लेख में प्रत्यक्ष शास्त्रीय उद्धरणों और आध्यात्मिक व्याख्याओं को अलग रखा गया है। प्रमुख संदर्भ हैं—

१. ऋग्वेद १०.१२५ — देवी सूक्त।
२. श्वेताश्वतरोपनिषद् ६.८ — परमात्मा की शक्ति का विवेचन।
३. मार्कण्डेयपुराण का देवीमाहात्म्य — दुर्गासप्तशती।
४. श्रीमद्भगवद्गीता १६.२१ — काम, क्रोध और लोभ के विषय में उपदेश।
५. बृहदारण्यक उपनिषद् २.४.५ — आत्मज्ञान के लिए श्रवण, मनन और निदिध्यासन।

लेख की मौलिकता के विषय में: यह लेख उपर्युक्त शास्त्रीय आधारों से प्रेरित होकर नए सिरे से संयोजित किया गया है। शास्त्रीय उद्धरण प्राचीन ग्रंथों से लिए गए हैं, जबकि उनके व्यावहारिक और दार्शनिक अनुप्रयोगों को व्याख्यात्मक रूप में प्रस्तुत किया गया है। यह दावा करना संभव नहीं कि इसका कोई विचार संसार में पहले कभी किसी अन्य लेखक ने व्यक्त नहीं किया है।

डॉ गिरीश राजौरिया ज्योतिषाचार्य
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Anjali Wala

अंजलि वाला पिछले कुछ सालों से पत्रकारिता में हैं। साल 2019 में उन्होंने मीडिया जगत में कदम रखा। फिलहाल, अंजलि DNP India वेब साइट में बतौर Sub Editor काम कर रही हैं। उन्होंने बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी से हिंदी पत्रकारिता में मास्टर्स किया है।
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