NCERT textbook row: राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) इस समय पूरे देश में चर्चा का केंद्र बना हुआ है। एनसीईआरटी आठवीं कक्षा की समाजिक विज्ञान किताब का एक अध्याय विवादों में आ गया है। एनसीईआरटी ने अपनी नई समाजिक विज्ञान के एक किताब में एक नया चैप्टर जोड़ा, जिसका नाम है “हमारे समाज में न्यायपालिका की भूमिका।” इस अध्याय का मकसद स्टूडेंट्स को देश के कानूनी व्यवस्था के बारे में अवगत कराना था, लेकिन इसमें कुछ ऐसी बातें शामिल थीं जिनसे न्यायपालिका की इमेज पर सवाल उठे। इस अध्याय को लेकर विवाद इतना बढ़ गया कि मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया। देश की सबसे बड़ी अदालत ने इस मामले में अहम कदम उठाए हैं। इस बारे में गहराई से जानने से पहले, यह समझना ज़रूरी है कि उस अध्याय में आखिर ऐसा क्या लिखा था जिससे सुप्रीम कोर्ट के जज और बड़े वकील भी नाराज़ हो गए।
एनसीईआरटी किताब विवाद: क्यों छिड़ा विवाद?
आपको बता दें कि कक्षा 8वीं की समाजिक विज्ञान की किताब में छपे ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ टाइटल से एक चैप्टर में इसमें बताया गया था कि कैसे अदालतों के अंदर भी भ्रष्टाचार और गलत आचरण की घटनाएं होती हैं। अध्याय में भारत की अदालतों में लटके हुए मुकदमों की एक लिस्ट दी गई थी। सबसे ज्यादा आपत्ति पूर्व सीजेआई बीआर गवई के एक बयान को शामिल करने पर सामने आई। किताब में उनका जुलाई 2025 का एक बयान छपा था, जिसमें उन्होंने कहा था कि भ्रष्टाचार की घटनाएं न्यायपालिका की छवि खराब करती हैं, हालांकि पारदर्शी एक्शन से इसे सुधारा जा सकता है। मामले की सुनवाई तीन जजों की पीठ कर रही है जिसकी अध्यक्षता मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत कर रहे हैं।
NCERT textbook row: सुप्रीम कोर्ट का बड़ा एक्शन
मालूम हो कि बुधवार को कक्षा 8वीं की समाजिक विज्ञान किताब में ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ टाइटल से एक अध्याय पर सर्वोच्च अदालत के आपत्ति जताने के बाद एनसीईआरटी ने माफ़ी जारी करते हुए विवादित किताब को वापस लेने का फ़ैसला किया था। सुप्रीम कोर्ट ने इस विवादित अध्याय का ड्राफ्ट बनाने में शामिल तीन लेखकों के खिलाफ एक सख्त आदेश देते हुए कहा है कि, वे आने वाली पीढ़ियों के लिए पाठ्यक्रम या किताब तैयार करने में शामिल होने के लायक नहीं हैं। कोर्ट ने जिन लोगों के नाम लिए गए हैं, उनमें प्रोफेसर मिशेल डैनिनो, सुपर्णा दिवाकर और आलोक प्रसन्ना कुमार शामिल हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने कक्षा 8वीं की एनसीईआरटी किताब में ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ पर अध्याय तैयार करने में अपनाए गए कंटेंट और प्रोसेस को गंभीरता से लेते हुए केंद्र सरकार, राज्य सरकारों, विश्वविद्यालयों और पब्लिक फंड पाने वाले सभी इंस्टीट्यूशन को इन तीनों लेखकों से अलग होने और उन्हें किसी भी पब्लिक फंडेड एकेडमिक काम में शामिल न करने का निर्देश दिया है।
बता दें कि मामले की सुनवाई के दौरान बेंच ने इसमें शामिल लेखकों के बारे में कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि प्रोफेसर मिशेल डैनिनो, सुपर्णा दिवाकर और आलोक प्रसन्ना कुमार को या तो भारतीय न्यायपालिका के बारे में ठीक से जानकारी नहीं थी या उन्होंने जानबूझकर तथ्यों को गलत तरीके से पेश किया, जिनसे कक्षा 8वीं के छात्रों के सामने न्यायपालिका की नाकारात्मक इमेज बनी। कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि इतनी जल्दी असर डालने वाली उम्र के छात्रों को संवैधानिक संस्थाओं के बारे में गलत या गुमराह करने वाली बातें नहीं दिखानी चाहिए।
