Bengal Assembly Election 2026 से पहले क्या SIR ने बदला सूबे का सियासी समीकरण? लाखों मतदाताओं का नाम कटना कैसे है खतरे की घंटी? समझें

Bengal Assembly Election 2026 से पहले एसआईआर प्रक्रिया पूरी करने के बाद मतदाताओं की अंतिम सूची जारी की गई है। इसके तहत करीब 91 लाख मतदाताओं के नाम कटने की खबर है जो सूबे का सियासी समीकरण बदल सकते हैं।

Bengal Assembly Election 2026

Picture Credit: गूगल (सांकेतिक तस्वीर)

Bengal Assembly Election 2026: तल्ख बयानबाजी और आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है। इसी बीच पश्चिम बंगाल के शहरों से लेकर ग्रामीण इलाकों तक में एसआईआर की चर्चा हो रही है। दरअसल, बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 से ठीक पहले संपन्न हुई एसआईआर प्रक्रिया के तहत करीब 91 लाख मतदाताओं के नाम सूची से कटे हैं। प्रतिशत में बात करें तो कुल मतदाताओं में करीब 12 फीसदी वोटर्स का नाम कट चुका है।

औसतन सूबे की सभी 294 विधानसभा सीटों पर 30-31 हजार मतदाता कम हुए हैं। सवाल उठ रहे हैं कि क्या बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 से पहले एसआईआर प्रक्रिया ने सूबे का सियासी समीकरण बदला है? कैसे लाखों मतदाताओं का नाम कटना किसी सियासी दल के लिए खतरे की घंटे हो सकती है? आइए इस पर विस्तार से चर्चा करते हैं।

क्या SIR ने Bengal Assembly Election 2026 से पहले बदला सूबे का सियासी समीकरण?

इस सवाल का हां या नहीं के रूप में पुख्ता जवाब देना थोड़ी जल्दबाजी होगी। हम आपके समक्ष कुछ तर्क पेश करेंगे जिसके सहारे सवाल का जवाब तलाशना शायद आसान हो सके। एसआईआर शुरू होने से पहले की बात करें तो बंगाल में करीब 7.66 करोड़ मतदाता थे। इस प्रक्रिया के बाद चुनाव आयोग द्वारा जारी सूची में करीब 91 लाख मतदाता कम हुए हैं। ये ऐसे मतदाता हैं जो विस्थापित, फर्जी, मृतक श्रेणी में आते हैं।

90 लाख से अधिक मतदाताओं का नाम कटना बंगाल की सभी 294 विधानसभा सीटों को प्रभावित करेगा। औसतन हर सीट पर 30-31 हजार मतदाता कम हुए हैं। मुर्शिदाबाद, मालदा, उत्तर दिनाजपुर, दक्षिण 24 परगना, बीरभूम, नादिया जैसे मुस्लिम बहुल जिलों में बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम कटे हैं। बंगाल की सत्तारुढ़ दल टीएमसी चुनाव आयोग पर मुस्लिम मतदाताओं के नाम काटने के आरोप लगा रही है।

यही वजह है कि चुनाव आयोग और टीएमसी आमने-सामने भी हुए। करीब 91 लाख मतदाताओं का नाम सूची से हटना सूबे का सियासी समीकरण बदलता है। विशेषज्ञों की मानें तो इसका सर्वाधिक प्रभाव सत्तारुढ़ टीएमसी पर पड़ सकता है। इसके साथ ही बंगाल का चुनावी मानचित्र भी बदल सकता है। हालांकि, स्पष्ट जवाब 4 मई को चुनावी नतीजों की घोषणा के बाद ही पता चल सकेगा।

लाखों मतदाताओं का नाम कटना कैसे है खतरे की घंटी?

बंगाल की सियासत पर नजर रखने वालों की मानें तो 90 लाख से अधिक मतदाताओं का नाम कटना कई मायनों में समीकरण को प्रभावित कर सकता है। इसका असर सूबे की सत्तारुढ़ दल पर पड़ने की संभावना है। दरअसल, ज्यादातर मुस्लिम मतदाताओं के नाम कटे हैं। बंगाल में मुस्लिम वर्ग को टीएमसी का वोटबैंक माना जाता है। ऐसे में बड़ी संख्या में मतदाताओं का नाम कटना टीएमसी के लिए नुकसानदेह हो सकता है।

हालांकि, स्पष्ट रूप से इस पर कुछ नहीं कहा जा सकता। मतुआ समुदाय के मतदाताओं के नाम भी अच्छे तादाद में कटे हैं। इससे क्षेत्रीय समीकरण प्रभावित होने की संभावना है। हालांकि, किसे लाभ होगा और किसके लिए खतरे की घंटी बजेगी इस पर स्पष्ट रूप से कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी। सभी को 23 अप्रैल और 29 अप्रैल के बाद 4 मई के दिन का इंतजार है जब मतगणना कर सभी सवालों के जवाब जनता के सामने होंगे।

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