US-Israel-Iran-War: मीडिल ईस्ट में जारी महायुद्ध कई देशों की चिंता बढ़ा रहा है। बताते चले कि यूएस-इजरायल-ईरान में युद्ध लगातार जारी है। जंग शुरू हुए एक हफ्ते से ज्यादा हो चुका है। कच्चे तेल की कीमतों में उछाल देखने को मिल रहा है। कई देशों में पेट्रोलृ-डीजल के दाम लगातार बढ़ रहे है। भारत में भी इसका असर देखने को मिल रहा है। जिसके बाद सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या ये युद्ध दुनिया के कई देशों के लिए अभियशाप बनने वाला है।
दरअसल कोई भी देश सप्लाई चेन और ऊर्जा से ही चलता है। सबसे खास बात है कि युद्ध जारी होने से इसमे असर देखने को मिल रहा है। अगर भारत की बात करें तो भारत तेजी से बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था है। लेकिन अगर युद्ध ज्यादा देर तक चलता है तो भारत पर भी इसका असर देखने को मिल सकता है।
वैश्विक ऊर्जा संकट का खतरा
मिडिल ईस्ट दुनिया का सबसे बड़ा तेल और गैस उत्पादन क्षेत्र है। ऐसे में यहां युद्ध का सीधा असर वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर पड़ता है। दुनिया के लगभग 20% तेल और एलएनजी का परिवहन होर्मुज जलडमरूमध्य से होता है। यदि यह मार्ग बाधित होता है, तो वैश्विक तेल सप्लाई में भारी कमी आ सकती है। युद्ध के बीच ब्रेंट क्रूड की कीमत 90 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंचने की खबरें सामने आई हैं। ऊर्जा की कीमत बढ़ने का असर केवल पेट्रोल-डीजल तक सीमित नहीं रहता। इससे बिजली, उद्योग और परिवहन की लागत भी बढ़ जाती है।
सप्लाई चेन पर बड़ा झटका
मिडिल ईस्ट कई महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों के बीच स्थित है। यदि युद्ध के कारण जहाजों की आवाजाही प्रभावित होती है, तो वैश्विक सप्लाई चेन पर गंभीर असर पड़ सकता है। समुद्री बीमा और शिपिंग लागत में तेज बढ़ोतरी हो सकती है। इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी और कच्चे माल की आपूर्ति बाधित हो सकती है। कई देशों में औद्योगिक उत्पादन प्रभावित होने की आशंका है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि तेल और गैस की आपूर्ति लंबे समय तक बाधित रहती है, तो परिवहन और लॉजिस्टिक्स सेक्टर में भारी महंगाई देखने को मिल सकती है।
एशियाई देशों पर सबसे ज्यादा असर
मिडिल ईस्ट के तेल पर सबसे अधिक निर्भरता एशियाई देशों की है। चीन, भारत, जापान और दक्षिण कोरिया मिलकर इस क्षेत्र से आने वाले तेल का बड़ा हिस्सा आयात करते हैं। जापान अपनी ऊर्जा जरूरतों का लगभग 87% आयात करता है, जबकि दक्षिण कोरिया लगभग 81% आयात पर निर्भर है। अगर तेल आपूर्ति बाधित होती है, तो इन देशों में ऊर्जा संकट, महंगाई और औद्योगिक उत्पादन में गिरावट देखी जा सकती है।






