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देश के शीर्ष उद्योगपति के निधन पर CM Mamata Banerjee ने जताया शोक! जानें Ratan Tata के जादू से कैसे हारा था Bengal?

Ratan Tata: बिछड़ा कुछ इस अदा से कि रुत ही बदल गई, इक शख़्स सारे शहर को वीरान कर गया।

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By: Gaurav Dixit

Published: अक्टूबर 10, 2024 11:24 पूर्वाह्न

Ratan Tata
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Ratan Tata: बिछड़ा कुछ इस अदा से कि रुत ही बदल गई, इक शख़्स सारे शहर को वीरान कर गया। खालिद शरीफ की ये गज़ल देश के शीर्ष उद्योगपति रतन टाटा (Ratan Tata) के निधन को बयां करता नजर आ रहा है। रतन टाटा का निधन बीते रात मुंबई (Mumbai) के ब्रीच कैंडी हॉस्पिटल (Breach Candy Hospital) में इलाज के दौरान हो गया। उनके निधन (Ratan Tata Death) से संपूर्ण देश में शोक की लहर दौड़ पड़ी है।

रतन टाटा के निधन के बाद उनसे जुड़े तमाम किस्से खंगाले जा रहे हैं। कोई उनकी सादगी की बात कर रहा है तो कोई उनके द्वारा किए गए नेक कार्यों का जिक्र कर उन्हें श्रद्धा-सुमन अर्पित कर रहा है। इसी बीच हम आपको रतन टाटा और पश्चिम बंगाल (West Bengal) की वर्तमान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी (CM Mamata Banerjee) के से जुड़े एक वाकये के बारे में बताएंगे। साथ ही ये भी बताएंगे कि कैसे Ratan Tata के जादू (Singur Nano Plant) से पश्चिम बंगाल हार गया था जिसकी कसक आज भी उन्हें रहती है?

Ratan Tata के निधन पर CM Mamata Banerjee की प्रतिक्रिया

बंगाल की वर्तमान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी (CM Mamata Banerjee) एक दौर में रतन टाटा के Singur Nano Plant की विरोधी रही थीं। हालाकि उन्होंने आज रतन टाटा के निधन पर शोक संवेदना व्यक्त कर अपनी प्रतिक्रिया दी है। सीएम बनर्जी के आधिकारिक एक्स हैंडल से पोस्ट जारी कर लिखा गया है कि “टाटा संस के मानद चेयरमैन रतन टाटा (Ratan Tata) के निधन से दुखी हूं। टाटा समूह के पूर्व अध्यक्ष भारतीय उद्योगों के अग्रणी नेता और सार्वजनिक-उत्साही परोपकारी व्यक्ति थे। उनका निधन भारतीय व्यापार जगत और समाज के लिए एक अपूरणीय क्षति होगी। उनके परिवार के सभी सदस्यों और सहकर्मियों के प्रति मेरी संवेदनाएं।”

Tata Group के Singur Nano Plant के विरोध से Mamata Banerjee का उदय!

पश्चिम बंगाल में दशकों से मुख्यमंत्री ममता बनर्जी (CM Mamata Banerjee) के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस (TMC) की सरकार है। लेकिन क्या आपको पता है कि ममता बनर्जी के सत्ता में आने के पीछे टाटा समूह (Tata Group) का अहम योगदान रहा है। दरअसल वर्ष 2006 में पश्चिम बंगाल की तत्कालिन बुद्धदेव भट्टाचार्य सरकार ने औद्योगीकरण को रफ्तार देने का काम शुरू किया। इस दिशा में रतन टाटा (Ratan Tata) के समहू से एक बड़ा करार किया गया। करार के मुताबिक हुगली जिले के सिंगूर इलाके की करीब 1000 एकड़ जमीन पर ‘नैनो’ कार का कारखाना लगना तय हुआ।

सिंगुर नैनो प्लांट (Singur Nano Plant) के लिए पश्चिम बंगाल सरकार ने टाटा समूह को 1000 एकड़ जमीन देने का ऐलान किया। इसके बाद अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू हुई और साथ ही शुरू हुआ हिंसा का दौर। दरअसल उस दौर में बंगाल की तेज-तर्रार महिला नेत्री ममता बनर्जी इस प्रोजेक्ट के खिलाफ थीं। दावा किया गया कि इससे किसानों को नुकसान होगा और उन्हें फसल उगाने के लिए भटकना पड़ेगा।

बीतते समय के साथ विरोध के स्वर उग्र हुए। इसी बीच 25 मई 2006 को टाटा कंपनी के अधिकारी सिंगूर की जमीन देखने पहुंचे। यहीं से शुरू होता है जनआंदोलन का दौर और सिंगुर के साथ आस-पास के इलाकों में भूमि अधिग्रहण के खिलाफ जमकर नारेबाजी हुई। आनन-फानन में बंगाल के औद्योगिक विकास निगम ने 17 जुलाई 2006 को हुगली जिलाधिकारी को जमीन के अधिग्रहण के संबंध में प्रस्ताव सौंपे जिसके बाद किसान सड़कों पर उतर गए और हाइवे जाम करना शुरू कर दिया।

पश्चिम बंगाल सरकार समझ चुकी थी कि ये काम आसान नहीं है। ऐसे में तत्कालीन मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने आंदोलन का नेतृत्व कर रहीं ममता बनर्जी को बातचीत के लिए आमंत्रित किया। हालाकि ममता नहीं गईं। इसी बीच समय बीतता गया और टाटा समूह ने बड़ा निर्णय ले लिया। टाटा समूह की ओर से रतन टाटा ने खुद 3 अक्टूबर 2008 को कोलकाता के प्राइम होटल में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर ऐलान किया कि वे नैनो प्लांट को सिंगुर में नहीं बनाएंगे और इसे अब गुजरात के सानंद में विस्थापित किया जाएगा। रतन टाटा के इस ऐलान के बाद इसको लेकर खूब सुर्खियां बनीं और बंगाल के हाथों से एक बड़ा उद्योग बिछड़ गया।

Ratan Tata के जादू से कैसे हारा था West Bengal?

टाटा समूह का सिंगुर नैनो प्लांट (Singur Nano Plant) हुगली से हटकर गुजरात के सानंद में बनाया गया। हालाकि इससे पश्चिम बंगाल के लोगों को एक तरह से करारी हार मिली। बता दें कि बंगाल का हुगली इलाका तब के दौर में अत्यंत पिछड़ा था। दावा किया गया कि अगर नैनो प्लांट हुगली के सिंगुर में लग जाता तो इससे लोगों की किस्मत बदल सकती थी।

नैनो प्लांट लगने से हजारों लोगों को रोजगार मिलता और साथ ही स्वरोजगार के अनेकों माध्यमों का सृजन होता। वहीं औद्योगिकरण को रफ्तार मिलता देख अन्य व्यापारिक समूह में बंगाल में अपनी दिलचस्पी दिखाते और निवेश की योजना बनाते। हालाकि ऐसा कुछ नहीं हुआ और पश्चिम बंगाल वर्ष 2006 से 2008 के बीच आंदोलन के कारण रतन टाटा के जादू से हार गया, जिसकी चर्चा आज भी होती है।

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Gaurav Dixit

गौरव दीक्षित पत्रकारिता जगत के उभरते हुए चेहरा हैं। उन्होनें चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय से अपनी पत्रकारिता की डिग्री प्राप्त की है। गौरव राजनीति, ऑटो और टेक संबंघी विषयों पर लिखने में रुची रखते हैं। गौरव पिछले दो वर्षों के दौरान कई प्रतिष्ठीत संस्थानों में कार्य कर चुके हैं और वर्तमान में DNP के साथ कार्यरत हैं।
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