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Ramzan में मुस्लिमों को छूट! तेलंगाना, आंध्र प्रदेश के बाद Assam में भी तुल पकड़ रहा मामला, धार्मिक आधार पर सहूलियत कितना सही?

Ramzan 2025: रमजान की शुरुआत से पहले ही सोशल मीडिया तुष्टिकरण, दोहरा चरित्र और तमाम अन्य उपमाओं से भर चुका है। दरअसल, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश के बाद अब मुस्लिमों को छुट्टी सीमा में छूट देने की मांग असम तक पहुंच गई है।

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By: Gaurav Dixit

Published: फ़रवरी 19, 2025 1:36 अपराह्न

Ramzan 2025
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Ramzan 2025: मुस्लिमों को छुट्टी सीमा में छूट देने की मांग असम तक पहुंच गई है। सीएम हिमंता बिस्वा सरमा के नेतृत्व वाले असम में रमजान 2025 से पहले उठ रही ये मांग कई मायनो में खास है। सवाल है कि क्या हिमंता बिस्वा सरमा का रुझान बदलेगा? क्या धार्मिक आधार पर सहूलियत देना सही है? Ramzan 2025 से पहले असम से लेकर तेलंगाना, हैदराबाद तक तुल पकड़ते इस मामले पर आज चर्चा की जाएगी। साथ ही ये बताएंगे कि असम में रमजान के दौरान मुस्लिम कर्मचारियों को छूट देने की मांग किसने की है।

Ramzan 2025 असम में भी तुल पकड़ रहा मुस्लिमों को छूट देने का मामला

असम में कांग्रेस के विधायक अब्दुर रशीद मंडल का कहना है कि “तेलंगाना और आंध्र प्रदेश सरकार का फैसला उचित है क्योंकि लोग शाम के समय (रमजान के दौरान) सुचारू रूप से काम करने की स्थिति में नही होते हैं। अगर असम सरकार भी इसे लागू करती है तो यह एक अच्छा निर्णय होगा।”

एआईयूडीएफ विधायक अमीनुल इस्लाम का कहना है कि “यह उचित है क्योंकि लोग पूरे दिन उपवास करते हैं। मैं असम सरकार से यह भी कहना चाहता हूं कि वह शुक्रवार की नमाज के कदम पर पुनर्विचार करें। (2024 का नियम जो मुस्लिम विधायकों को शुक्रवार को नमाज अदा करने के लिए दो घंटे के ब्रेक को खत्म करता है)।”

गौर करने वाली बात है कि तेलंगाना की कांग्रेस और आंध्र प्रदेश की NDA सरकार ने बीते दिन Ramzan 2025 को लेकर बड़ा ऐलान किया। इन दोनों राज्यों में रमजान के दौरान मुसलमानों के लिए काम के घंटे कम करने का निर्णय लिया गया है। ऐसे में देखना दिलचस्प होगा कि क्या असम सीएम हिमंता बिस्वा सरमा भी विधायकों की मांग मानते है।

धार्मिक आधार पर सहूलियत देना कितना सही?

बड़ा सवाल है कि सरकारें अपने-अपने हिस्से का तर्क प्रस्तुत करते हुए सहूलियतों का ऐलान करती रहती हैं। पर Ramzan 2025 हो या कुछ और, धार्मिक आधार पर छूट दिना कितना सही है? जिनके हाथ में नीति बनाने की जिम्मेदारी है, उनमें एक धड़ा इसे सही मानता है। वहीं दक्षिणपंथ की विचारधारा रखने वाली पार्टियां इसे तुष्टिकरण तक की उपमा दे देती हैं। ऐसे में कोई कैसे इस सवाल का जवाब ढूंढ़े। बदलते राज्य और स्थान की साथ इस सवाल का जवाब भी बदल रहा है। कोई धार्मिक आधार पर सहूलियत देने वाले निर्णय को सही बताता है, तो कोई इसे दोहरा चरित्र और तुष्टिकरण बता रहा है। फिलहाल इस सवाल के साथ हम आपको छोड़े जा रहे हैं। आप अपनी बुद्धि-विवेका का इस्तेमाल कर सोचिएगा और एक निष्कर्ष तक पहुंचने की कोशिश कीजिएगा।

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Gaurav Dixit

गौरव दीक्षित पत्रकारिता जगत के उभरते हुए चेहरा हैं। उन्होनें चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय से अपनी पत्रकारिता की डिग्री प्राप्त की है। गौरव राजनीति, ऑटो और टेक संबंघी विषयों पर लिखने में रुची रखते हैं। गौरव पिछले दो वर्षों के दौरान कई प्रतिष्ठीत संस्थानों में कार्य कर चुके हैं और वर्तमान में DNP के साथ कार्यरत हैं।
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