Ajit Pawar Death: महाराष्ट्र में एक बार फिर सियासी हलचल तेज हो गई है। अजित पवार के निधन के बाद राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व को लेकर सवालों का अंबार लगा है। अजित पवार के बाद एनसीपी की बागडोर कौन संभालेगा ये सवाल अब भी प्रासंगिक है। अजित पवार की पत्नी सुनेत्रा पवार खुद आगे आएंगी या संघर्षों के साथी प्रफुल्ल पटेल, छगन भुजबल में किसी एक को जिम्मेदारी मिल सकती है? या पार्थ पवार को एनसीपी अपने नेतृत्वकर्ता के रूप में प्रोजेक्ट कर सकती है? ऐसे तमाम सवाल हैं जो अजित पवार के निधन के बाद महाराष्ट्र की सियासत का पारा बढ़ा रहे हैं। आइए इन सभी सवालों का जवाब ढूंढ़ने के साथ ‘अजित दादा’ के संभावित उत्तराधिकारी की चर्चा करते हैं।
‘अजित दादा’ के निधन के बाद कौन संभाल सकता है NCP की बागडोर?
बारामती के ‘अजित दादा’ नहीं रहे। विमान हादसे में हुई दुखद मौत ने एनसीपी में नेतृत्व को लेकर नए सिरे से संग्राम छेड़ दिया है। अजित पवार की पत्नी सुनेत्रा पवार, छगन भुजबल, पंकजा मुंडे, प्रफुल्ल पटेल समेत अन्य कई नेता मौन की स्थिति में हैं। हालांकि, अंदरखाने एनसीपी की कमान संभालने को लेकर चर्चा जारी है। इसमें सबसे प्रमुख दावेदार हैं अजित पवार की पत्नी सुनेत्रा जो फिलहाल राज्यसभा सांसद हैं। यदि वे सहमत होती हैं, तो संभवत: महाराष्ट्र के अगले डिप्टी सीएम के रूप में उन्हें देखा जा सकता है। लेकिन यदि सुनेत्रा पवार फ्रंट से एनसीपी को लीड करने में असहमति व्यक्त करती हैं, तो प्रफुल्ल पटेल अजित पवार के संभावित उत्तराधिकारी हो सकते हैं।
दरअसल, प्रफुल्ल पटेल और अजित दादा का तीन दशक से ज्यादा का सियासी संबंध रहा है। जब 2019 में एनसीपी में बगावत हुई, तब प्रफुल्ल पटेल ने साहेब (शरद पवार) का साथ छोड़ अजित दादा का साथ दिया था। प्रफुल्ल पटेल ने एनसीपी पर हक की लड़ाई में भी सभी कानूनी कार्रवाई को बारीकी से देखा था। उनके औद्योगिक घरानों में भी अच्छे संबंध हैं जो एनसीपी के लिए संसाधन जुटाने में मददगार साबित हो सकते हैं। यही वजह है कि सुनेत्रा पवार के मना करने पर प्रफुल्ल पटेल को अजित पवार के संभावित उत्तराधिकारी के रूप में देखा जा रहा है। छगन भुजबल व अन्य कुछ नेता भी इस दौड़ में शामिल हैं।
एनसीपी के समक्ष बढ़ गई चुनौतियां!
बारामती विमान हादसे में अजित पवार की दुखद मौत के बाद एनसीपी के समक्ष चुनौतियां बढ़ गई हैं। पहले अजित पवार पार्टी से लेकर परिवार तक के मुखिया थे और बगैर किसी संकोच के फैसले लेते थे। हालांकि, अब स्थिति अलग है। अब उनके निधन के बाद निर्णयकर्ता की कमी हो गई है। इससे कार्यकर्ताओं के बीच असंतोष देखने को मिल सकता है। साथ ही नेतृत्व संभालने की लालसा भी दिग्गज नेताओं के मन में असंतोष के भाव जागृत कर सकती है। ऐसे में देखना दिलचस्प होगा कि निकट भविष्य में एनसीपी की कमान कौन संभालता है और कैसे पार्टी इस चुनौती से पार पाती है।
