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क्या है Roopkund Jheel की रहस्यमयी स्टोरी? जहां आज भी सतह पर तैरती है इंसानों की हड्डियां; वीडियो देख सहम जाएगा कलेजा

Roopkund Jheel: हम आज एक ऐसी झील की बात करन वाले है, जो एक गहरे राज दबाकर बैठी है। जहां कंकाल सतह पर तैरता हुआ नजर आता है।

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By: Anurag Tripathi

Published: जुलाई 1, 2025 3:57 अपराह्न

Roopkund Jheel
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Roopkund Jheel: बड़ी संख्या में लोग पहाड़ो पर ट्रैक करने, खूबसूरत वादियों का लुत्फ उठाने के लिए वहां जाते है। पहाड़ो के लिए एक कहावत कही जाती है, जो जितना खूबसूरत होता है, उतना ही डरावना होता है। हम आज एक ऐसी झील की बात करन वाले है, जो एक गहरे राज दबाकर बैठा है। हिमालय की गोद में, समुद्र तल से 16499 फीट की ऊंचाई पर Uttarakhand के Chamoli जिले देवाल विकासखंड में बसी एक ऐसी झील जो अपनी सुंदरता के साथ-साथ अपने, भयावह रहस्यों के लिए भी जाना जाता है। जिसका नाम है Roopkund Jheel बता दें कि roopkund में आज भी इंसानों की हड्डियां तैरती हुई नजर आती है। चलिए आज हम आपको बताएंगे, इसके रहस्य की असल सच्चाई। DNP India चैनल पर वीडियो के माध्यम से रूपकुंड झील से जुड़े रहस्य को बताया गया है, जिसके देख आपका कलेजा कांप जाएगा।

Roopkund Jheel में आज भी तैरती है इंसानों की हड्डियां

Uttarakhand के Chamoli जिले देवाल विकासखंड में बसी Roopkund Jheel एक रहस्यमयी झील है, कई बार वैज्ञानिक इस roopkund झील का रहस्य जानने के लिए आए लेकिन उन्हें निराशा ही साथ लगी। स्थानीय लोग इस रहस्य को माता के प्रकोप से जोड़कर देखते हैं। यहां के बड़े बुजुर्गों का मानना है कि, जिन लोगों के ये कंकाल हैं।

वो लोग माता के प्रकोप का शिकार हुए थे। स्थानीय लोककथाएं रूपकुंड के कंकालों को, नंदादेवी के श्राप से जोड़ती हैं। कहा जाता है कि एक राजा ने अपनी गर्भवती रानी और सैनिकों के साथ नंदादेवी के पवित्र क्षेत्र में प्रवेश किया और नियमों का उल्लंघन किया। जिसके बाद माता ने भयंकर ओलावृष्टि भेजी, जिसमें पूरा दल मारा गया।

1942 में रूपकुंड झील की हुई थी खोज

जानकारी के मुताबिक रूपकुंड झील की खोज सबसे पहले 1942 में एच.के. माधवाल एक ब्रिटिश फॉरेस्ट गार्ड ने की थी। एच.के. माधवाल अपने साथियों के साथ हिमालय में गश्त कर रहे थे। तभी उनकी नजर इस झील के किनारे और पानी में पड़े सैकड़ों मानव कंकाल पर पड़ी, एच.के. माधवाल भी इन्हें देखकर काफी हैरान हुए। क्योंकि इतनी बड़ी संख्या में इंसानों के कंकाल मिलना वो भी एक ही जगह पर कोई सामान्य बात नहीं थी। इस खोज ने दुनिया भर का ध्यान आकर्षित किया। माधवाल और उनके साथियों ने झील के किनारे और पानी में लगभग 300 से 600 मानव कंकाल देखे। जिसके बाद उसे कंकालों की झील यानि Roopkund Jheel का नाम दे दिया गया।

2004 में भी Roopkund Jheel की खौफनाक कहानी आई थी सामने

Uttarakhand के Chamoli में बसे इस खूबसूरत और डरावना Roopkund Jheel को भारतीय और यूरोपीय वैज्ञानिकों की एक संयुक्त टीम ने रहस्य को सुलझाने की कोशिश की,वैज्ञानिकों ने कंकालो की रेडियोकार्बन डेटिंग की तकनीक से जांच की, ये तकनीक कार्बन-14 नामक एक रेडियोएक्टिव आइसोटोप के क्षय पर आधारित होती है। और रेडियोकार्बन डेटिंग से पता चला कि ये कंकाल 850 ईस्वी के आसपास के हैं। यानी 12वीं से 15वीं सदी के बीच के हैं। डीएनए विश्लेषण में ये भी खुलासा हुआ कि कुछ कंकाल स्थानीय हिमालयी लोगों के थे, जबकि कुछ ग्रीक मूल के लोगों के थे। रिसर्च में ये भी पता लगा कि लोग बीमारी से नहीं बल्कि अचानक आई ओलावृष्टि या तेज तूफान के कारण मरे थे।

आज भी कई सवालों को अपने गर्भ में छिपाए है रूपकुंड झील

Roopkund Jheel आज भी कई सवालों को अपने गर्भ में छिपाए हुए है।क्या ये लोग तीर्थयात्री थे। जो नंदादेवी की यात्रा पर निकले थे। या फिर व्यापारी जो प्राचीन व्यापारिक मार्गों से गुजर रहे थे… ग्रीक मूल के लोग हिमालय की इस दुर्गम चोटी तक कैसे पहुंचे। और सबसे बड़ा सवाल—क्या ये सिर्फ प्रकृति का क्रूर खेल था। या वाकई कोई अलौकिक शक्ति इसमें शामिल थी।
वैज्ञानिकों ने कई जवाब खोजने की कोशिश कि लेकिन हर बार ये जवाब एक नया सवाल छोड़कर जाता था।

हर वैज्ञानिक का मत अलग हर वैज्ञानिक की अपनी theory और इस सब के चलते रूपकुंड का रहस्य अभी भी पूरी तरह सुलझा नहीं है। यही वजह है कि ये जगह तब भी रहस्यमई थी और आज भी रहस्यमई है। वैसे तो Uttarakhand में कई ऐसे जगह है, जो काफी रहस्यों से भरी हुई है, लेकिन ये रूपकुंड झील उनसे काफी अलग और डरावनी है।

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Anurag Tripathi

अनुराग त्रिपाठी को पत्रकारिता का 2 साल से अधिक का अनुभव है। उन्होंने महर्षि दयानंद यूनिवर्सिटी से अपनी पत्रकारिता की डिग्री प्राप्त की है। वह बिजनेस, यूटिलिटी, पॉलिटिक्स विषयों पर लिखने में रूचि रखते है। वर्तमान में वह डीएनपी इंडिया के साथ कार्यरत है।
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