वैश्विक शांति या निजी लाभ? US-Iran War Ceasefire के लिए क्यों बेचैन था पाकिस्तान? विशेषज्ञों ने खोला पर्दे के पीछे हुई वार्ता की पोल

US-Iran War Ceasefire का बढ़-चढ़कर श्रेय लेने वाले पाकिस्तान ने निजि लाभ के लिए इतनी उछल-कूद मचाई। ये विशेषज्ञों का मानना है। दरअसल, युद्ध के कारण पाकिस्तान अंदरखाने तबाह हो चुका था जो मध्यस्थता का प्रमुख कारण माना जा रहा है।

US-Iran War Ceasefire

Picture Credit: गूगल (सांकेतिक तस्वीर)

US-Iran War Ceasefire: दुनिया में पाकिस्तान को लेकर सुर्खियां बन रही हैं। भला बने भी क्यों नहीं, भारत के पड़ोसी कंगाल मुल्क ने यूएस-ईरान वॉर सीजफायर में मध्यस्थता की भूमिका जो निभाई है। प्रेसिडेंट डोनाल्ड ट्रंप और ईरानी विदेश मंत्री अराघची की स्वीकारोक्ति के बाद ये जगजाहिर है कि शहबाज शरीफ और आसिम मुनीर ने अमेरिका और ईरान से वार्ता की है।

हालांकि, पाकिस्तान सीजफायर के लिए इतना बेचैन क्यों था इसको लेकर विशेषज्ञों की राय दिलचस्प है। विदेशी मामलों पर नजर रखने वालों की मानें तो पाकिस्तान पश्चिम एशिया में छिड़े संघर्ष के कारण तबाह हो चुका था। आर्थिक मोर्चे पर मुल्क को भारी नुकसान झेलना पड़ रहा था। महंगाई आसमान छू रही थी। ये तमाम निजी लाभ हैं जो पाकिस्तान को अंदरखाने बेचैन कर रहे थे।

US-Iran War Ceasefire के लिए क्यों बेचैन था पाकिस्तान?

वैश्विक मामलों पर नजर रखने वाले विशेषज्ञों की मानें तो पाकिस्तान द्वारा की गई पहल के पीछे निजी हितों का विशेष महत्व है। ये जगजाहिर है कि यूएस-ईरान वॉर के कारण पड़ोसी मुल्क की अर्थव्यवस्था चौपट होने के कगार पर खड़ी थी। ईंधन के साथ खाद्य वस्तुओं की बढ़ती कीमतों ने आवाम के समक्ष बड़ी चुनौती पैदा कर दी थी। पाकिस्तान में ऊर्जा संकट गहरा रहा था।

आवाम के लिए तमाम प्रतिबंध लागू करने पड़े थे। पीएम शहबाज शरीफ खुद पश्चिम एशिया संघर्ष का दंश स्वीकार चुके थे। ये सारे अहम कारण रहे कि क्यों पाकिस्तान मध्यस्थता के लिए बेचैन था। विशेषज्ञों का साफ कहना है कि विश्व में कई बार अशांति का कारण बन चुके पाकिस्तान का वैश्विक शांति से कोई लेना-देना नहीं था। भारत के पड़ोसी मुल्क ने निजी हितों को ध्यान में रखते हुए तत्परता दिखाई और मध्यस्थता में भूमिका निभाई।

इस्लामाबाद में शांति वार्ता को लेकर गहमा-गहमी तेज!

युद्धविराम पर अमेरिका-इजरायल के साथ ईरान भी सहमत हो गया है। सभी ने हामी भर दी है और अगले दो सप्ताह तक हमलों का दौर थमने की बात कही गई है। पाकिस्तान की ओर से 11 अप्रैल का दिन इस्लामाबाद में शांति वार्ता के लिए प्रस्तावित किया गया है। इसको लेकर गहमा-गहमी तेज है। दुनिया की नजरें अमेरिका-इजरायल पर टिकीं हैं।

शांति वार्ता के लिए स्थान का चयन भले हो गया है, लेकिन चुनौतियां अभी कम नही हुई हैं। यदि अमेरिका, इजरायल या ईरान में से किसी ने भी समझौता तोड़ा तो पाकिस्तान की कुटनीति फेल हो जाएगी। इसके बाद स्थिति को नियंत्रित कर पाना पाकिस्तान की हाथ से बाहर होगा। फिलहाल सबकी नजरें 11 अप्रैल को इस्लामाबाद में होने वाले शांति वार्ता पर टिकीं हैं।

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