---Advertisement---

दीपावली महापर्व : महालक्ष्मी उपासना, महारात्रि, महानिशा एवं तांत्रिक साधना का शास्त्रीय महत्त्व

Diwali Mahaparv: दीपावली अत्यंत महत्त्वपूर्ण एवं पुण्यमय पर्व है। यह पर्व कार्तिक मास की अमावस्या तिथि को मनाया जाता है। दीपावली का मूल भाव अन्धकार से प्रकाश की ओर, अज्ञान से ज्ञान की ओर तथा अभाव से समृद्धि की ओर अग्रसर होना है। दीपावली की रात्रि में भगवती महालक्ष्मी की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। भगवान गणेश, भगवती सरस्वती तथा भगवान कुबेर का पूजन भी प्रचलित गृहस्थ परम्परा का अंग है।

Avatar of Anjali Wala

By: Anjali Wala

Published: नवम्बर 7, 2026 3:29 अपराह्न

Diwali Mahaparv
Follow Us
---Advertisement---

Diwali Mahaparv: सनातन धर्म में दीपावली अत्यंत महत्त्वपूर्ण एवं पुण्यमय पर्व है। यह पर्व कार्तिक मास की अमावस्या तिथि को मनाया जाता है। दीपावली का मूल भाव अन्धकार से प्रकाश की ओर, अज्ञान से ज्ञान की ओर तथा अभाव से समृद्धि की ओर अग्रसर होना है।

1. दीपावली का धार्मिक एवं पौराणिक महत्त्व

दीपावली की रात्रि में भगवती महालक्ष्मी की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। भगवान गणेश, भगवती सरस्वती तथा भगवान कुबेर का पूजन भी प्रचलित गृहस्थ परम्परा का अंग है।

इस पर्व के धार्मिक महत्त्व का प्रत्यक्ष उल्लेख स्कन्दपुराण के वैष्णवखण्ड में मिलता है।

प्रमाण : स्कन्दपुराण, वैष्णवखण्ड, अध्याय 106, श्लोक 71–72

«ततः प्रदोषसमये पूजयेदिंदिरां शुभाम्।
कुर्यान्नानाविधैर्वस्त्रैः स्वच्छं लक्ष्म्याश्च मण्डपम्॥

नानापुष्पैः पल्लवैश्च चित्रैश्चाऽपि विचित्रितम्।
तत्र संपूजयेल्लक्ष्मीं देवांश्चाऽपि प्रपूजयेत्॥»

भावार्थ : प्रदोषकाल में शुभस्वरूपा भगवती इन्दिरा अर्थात् महालक्ष्मी का पूजन करना चाहिए। लक्ष्मीजी के लिए स्वच्छ एवं सुन्दर मण्डप बनाकर उसे विविध वस्त्रों, पुष्पों एवं पल्लवों से सजाना चाहिए। वहाँ भगवती लक्ष्मी के साथ अन्य देवताओं का भी पूजन करना चाहिए।

इस प्रमाण से स्पष्ट होता है कि दीपावली की रात्रि में प्रदोषकालीन लक्ष्मी पूजन का पुराणों में विधान प्राप्त होता है।

2. भगवती महालक्ष्मी, महासरस्वती एवं महाकाली की उपासना

देवी उपासना की शाक्त परम्परा में भगवती के तीन प्रमुख स्वरूपों का विशेष महत्त्व है।

1. महालक्ष्मी – ऐश्वर्य, समृद्धि एवं पालन की शक्ति।
2. महासरस्वती – ज्ञान, विद्या, वाणी एवं विवेक की शक्ति।
3. महाकाली – दुष्ट प्रवृत्तियों के विनाश एवं शक्ति की अधिष्ठात्री।

देवीमाहात्म्य अर्थात् दुर्गासप्तशती में भगवती की सर्वव्यापक शक्ति का वर्णन मिलता है।

प्रमाण : देवीमाहात्म्य, अध्याय 5, देवीसूक्त स्तुति

«या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥»

भावार्थ : जो भगवती समस्त प्राणियों में शक्तिरूप से विद्यमान हैं, उन जगदम्बा को बारम्बार नमस्कार है।

इस प्रकार भगवती की उपासना केवल भौतिक सुख-सुविधाओं की प्राप्ति तक सीमित नहीं है, अपितु आत्मिक शक्ति, ज्ञान, विवेक एवं जीवन के कल्याण का भी साधन है।

3. दीपावली की रात्रि एवं महारात्रि का शास्त्रीय प्रमाण

दीपावली की रात्रि के सम्बन्ध में स्कन्दपुराण में एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण वर्णन प्राप्त होता है।

प्रमाण : स्कन्दपुराण, वैष्णवखण्ड, अध्याय 106, श्लोक 58

«महारात्रिः समुत्पन्ना चतुर्दश्यां मुनीश्वराः।
अतस्तदुत्सवः कार्यः शक्तिपूजापरायणैः॥»

भावार्थ : हे मुनिश्रेष्ठों! चतुर्दशी तिथि में महारात्रि का प्रादुर्भाव हुआ। इसलिए शक्ति की उपासना में तत्पर रहने वाले साधकों को इस उत्सव का विधान करना चाहिए।

आगे इसी अध्याय के श्लोक 59–60 में वर्णन आता है कि बलिराज्य के समय यक्ष, गन्धर्व, किन्नर, औषधियाँ, पिशाच, मंत्र तथा मणियाँ आदि रात्रि के प्रारम्भ में प्रसन्न होकर नृत्य करते हैं तथा अपने-अपने मंत्र सिद्ध होते हैं।

प्रमाण : स्कन्दपुराण, वैष्णवखण्ड, अध्याय 106, श्लोक 59–60

«सर्व एव प्रहृष्यंति नृत्यंति च निशामुखे।
तत्तन्मंत्राश्च सिद्ध्यंति बलिराज्ये न संशयः॥»

भावार्थ : उस समय सभी प्रसन्न होकर रात्रि के प्रारम्भ में नृत्य करते हैं और बलिराज्य में अपने-अपने मंत्र सिद्ध होते हैं, इसमें संशय नहीं है।

यहाँ विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है कि पुराण में महारात्रि का सम्बन्ध चतुर्दशी से बताया गया है। अतः इसे अमावस्या की पूरी रात्रि के समानार्थक मानना उचित नहीं होगा।

इसी आधार पर दीपावली की अमावस्या एवं उसके पूर्ववर्ती चतुर्दशी काल में प्रचलित शक्ति-साधना की परम्पराओं को समझना चाहिए।

4. महानिशा एवं तांत्रिक साधना

तंत्रशास्त्र की विभिन्न शाक्त परम्पराओं में अमावस्या तथा मध्यरात्रि के समय को विशेष साधना काल माना गया है।

मंत्र, यंत्र एवं तंत्र साधना के प्रमुख अंग माने जाते हैं। साधक गुरु-परम्परा के अनुसार देवी-देवताओं का मंत्रजप, ध्यान, पूजन एवं हवन करते हैं।

स्कन्दपुराण में दीपावली के प्रसंग में मंत्र-सिद्धि का उल्लेख होने से इस रात्रि के साधनात्मक महत्त्व की पुष्टि होती है।

हालाँकि आकर्षण, वशीकरण, उच्चाटन, श्मशान साधना एवं शव साधना आदि विशिष्ट तांत्रिक प्रयोगों का विधान अलग-अलग तंत्रग्रंथों एवं गुरु-परम्पराओं में मिलता है। इन सभी प्रयोगों को स्कन्दपुराण के उपर्युक्त श्लोकों का प्रत्यक्ष विधान नहीं कहा जा सकता।

विशेष साधनाओं का उद्देश्य साधक की आध्यात्मिक उन्नति, आत्मसंयम एवं शक्ति-उपासना होना चाहिए।

5. कालरात्रि एवं शत्रु विनाश का आध्यात्मिक अर्थ

भगवती महाकाली को दुष्ट प्रवृत्तियों एवं आसुरी शक्तियों के विनाश की अधिष्ठात्री माना गया है।

दीपावली की रात्रि में महाकाली की उपासना का एक गहन आध्यात्मिक अर्थ यह भी है कि मनुष्य अपने भीतर के शत्रुओं का नाश करे।

श्रीमद्भगवद्गीता के सोलहवें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने काम, क्रोध एवं लोभ को आत्मविनाश के तीन द्वार बताया है।

प्रमाण : श्रीमद्भगवद्गीता 16.21

«त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः।
कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्॥»

भावार्थ : काम, क्रोध और लोभ आत्मा के पतन के तीन द्वार हैं। अतः मनुष्य को इन तीनों का त्याग करना चाहिए।

अतः भगवती की आराधना के साथ अहंकार, ईर्ष्या, द्वेष, क्रोध, लोभ एवं घृणा जैसी नकारात्मक प्रवृत्तियों का त्याग करना ही वास्तविक शत्रु-विनाश है।

6. महालक्ष्मी उपासना का वैदिक प्रमाण

भगवती महालक्ष्मी की उपासना के लिए श्रीसूक्त का विशेष महत्त्व है। श्रीसूक्त ऋग्वेदीय परम्परा से सम्बद्ध प्रसिद्ध श्रीस्तुति है।

प्रमाण : श्रीसूक्त, प्रथम ऋचा

«हिरण्यवर्णां हरिणीं सुवर्णरजतस्रजाम्।
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह॥»

भावार्थ : हे अग्निदेव! आप मेरे लिए स्वर्ण के समान तेजस्विनी, सुवर्ण एवं रजत की माला धारण करने वाली, चन्द्रमा के समान प्रकाशमान तथा हिरण्मयी भगवती लक्ष्मी को आवाहित करें।

श्रीसूक्त की दूसरी ऋचा में भगवती से ऐसी लक्ष्मी की कामना की गई है जो स्थिर एवं निरन्तर बनी रहे।

«तां म आवह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम्।
यस्यां हिरण्यं विन्देयं गामश्वं पुरुषानहम्॥»

भावार्थ : हे अग्निदेव! आप मेरे लिए ऐसी लक्ष्मी को आवाहित करें जो कभी दूर न जाने वाली हों और जिनकी कृपा से धन, पशुधन एवं समृद्धि प्राप्त हो।

इसलिए दीपावली की रात्रि में श्रीसूक्त पाठ, महालक्ष्मी पूजन एवं दीपदान का विशेष महत्त्व है।

7. भगवान गणेश, भगवती सरस्वती एवं कुबेर पूजन

दीपावली के अवसर पर महालक्ष्मी के साथ भगवान गणेश का पूजन विशेष रूप से प्रचलित है।

भगवान गणेश को विघ्नविनाशक तथा बुद्धि एवं सिद्धि का अधिष्ठाता माना जाता है।

भगवती सरस्वती विद्या, वाणी एवं विवेक की अधिष्ठात्री हैं। भगवान कुबेर देवताओं के धनाध्यक्ष एवं यक्षों के अधिपति माने जाते हैं।

श्रीमद्भगवद्गीता के दशम अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण अपनी विभूतियों का वर्णन करते हुए कहते हैं—

प्रमाण : श्रीमद्भगवद्गीता 10.34

«कीर्तिः श्रीर्वाक्च नारीणां स्मृतिर्मेधा धृतिः क्षमा॥»

भावार्थ : कीर्ति, श्री, वाणी, स्मृति, मेधा, धृति एवं क्षमा परमात्मा की दिव्य विभूतियाँ हैं।

इससे श्री, वाणी एवं मेधा के महत्त्व का बोध होता है।

भगवती महालक्ष्मी की कृपा से धन एवं ऐश्वर्य, भगवती सरस्वती की कृपा से विद्या एवं विवेक तथा भगवान गणेश की कृपा से बुद्धि एवं विघ्नों का निवारण प्राप्त करने की प्रार्थना करनी चाहिए।

भगवान कुबेर की उपासना से धन-संग्रह एवं आर्थिक समृद्धि की कामना की जाती है।

8. दीपावली में स्थिर लग्न का ज्योतिषीय महत्त्व

ज्योतिषशास्त्र में बारह राशियों में वृषभ, सिंह, वृश्चिक एवं कुम्भ राशियों को स्थिर राशि कहा गया है।

राशि| राशि स्वभाव
वृषभ| स्थिर
सिंह| स्थिर
वृश्चिक| स्थिर
कुम्भ| स्थिर

दीपावली पर स्थिर लग्न में महालक्ष्मी पूजन करने की परम्परा प्रचलित है।

इसके पीछे ज्योतिषीय मान्यता यह है कि स्थिर लग्न में किया गया शुभ कार्य स्थिरता का प्रतीक माना जाता है।

भगवती लक्ष्मी को चंचला कहा गया है। इसलिए स्थिर लग्न में पूजन करके घर में धन, धान्य एवं ऐश्वर्य की स्थिरता की कामना की जाती है।

प्रदोषकालीन वृषभ लग्न में महालक्ष्मी पूजन को विशेष महत्त्व दिया जाता है।

यह एक प्रचलित ज्योतिषीय मुहूर्त परम्परा है, न कि इस आशय का कोई प्रत्यक्ष वैदिक श्लोक कि स्थिर लग्न में पूजन करने से लक्ष्मी निश्चित रूप से स्थायी हो जाती हैं।

9. दीपावली 2026 : पंचांग एवं ज्योतिषीय गणना

वर्ष 2026 में दीपावली का पर्व रविवार, 8 नवम्बर को है।

उज्जैन के स्थानीय पंचांग के अनुसार—

– कृष्ण चतुर्दशी समाप्ति : 8 नवम्बर को प्रातः लगभग 11 बजकर 27 मिनट।
– अमावस्या प्रारम्भ : 8 नवम्बर को प्रातः लगभग 11 बजकर 27 मिनट।
– अमावस्या समाप्ति : 9 नवम्बर को दोपहर लगभग 12 बजकर 31 मिनट।
– रविवार को सूर्यास्त : लगभग शाम 5 बजकर 45 मिनट।

इस प्रकार अमावस्या तिथि प्रदोषकाल, निशीथकाल एवं अगले दिन के प्रातःकाल में विद्यमान रहेगी।

लेखक : डॉ. गिरीश राजौरिया
ज्योतिषाचार्य

Avatar of Anjali Wala

Anjali Wala

अंजलि वाला पिछले कुछ सालों से पत्रकारिता में हैं। साल 2019 में उन्होंने मीडिया जगत में कदम रखा। फिलहाल, अंजलि DNP India वेब साइट में बतौर Sub Editor काम कर रही हैं। उन्होंने बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी से हिंदी पत्रकारिता में मास्टर्स किया है।
For Feedback - feedback@dnpnewsnetwork.com

Join WhatsApp

Join Now

Join Telegram

Join Now

Related News

Rashifal 6 November 2026

नवम्बर 5, 2026

Rashifal 4 November 2026

नवम्बर 3, 2026

Rashifal 3 November 2026

नवम्बर 2, 2026

Rashifal 2 November 2026

नवम्बर 1, 2026

Rashifal 1 November 2026

अक्टूबर 31, 2026

Rashifal 29 October 2026

अक्टूबर 28, 2026