Ajit Pawar: जनहित को प्राथमिकता देने वाला एक लोकप्रिय नेता दुनिया को अलविदा बोल चुका है। एक ऐसा नेता जिसके दरवाजे सुबह होते ही बारामती समेत देश के विभिन्न हिस्सों से आने वाली जनता के लिए खुले रहते थे। अंतिम समय तक जो अपने हिस्से की जिम्मेदारी पूरी करता रहा। ऐसे अजित पवार को हमने 28 जनवरी की सुबह बारामती विमान हादसे में खो दिया। अजित पवार आज हमारे बीच नहीं है, लेकिन उनकी स्मृतियां कई रूप में लोगों के बीच मौजूद हैं।
कोई उनके सियासी सफर की चर्चा कर रहा है, तो कोई ‘अजित दादा’ के मिलनसार व्यक्तित्व का जिक्र कर रहा है। इस बीच हम पाठकों को बताएंगे कि कैसे अजित पवार अपने चाचा शरद पवार की ऊंगलियां पकड़ कर राजनीतिक ककहरा सीखने में कामयाब हुए? कैसे वे अल्प समय में बारामती के ‘सहकारी सम्राट’ बन गए? अजित पवार ने कैसे चीनी मिलों में अपने नेटवर्क की बदौलत खुद को महाराष्ट्र की सियासत में स्थापित कर लिया? आइए इन सभी सवालों का जवाब ढूंढ़ने की कोशिश करते हैं।
बारामती के ‘सहकारी सम्राट’ Ajit Pawar का सियासी सफर!
सीएम फडणवीस हों, एकनाथ शिंदे हों या महाराष्ट्र की सियासत के अन्य तमाम दिग्गज नेता। सभी के लिए बड़े भाई यानी दादा के रूप में मौजूद रहने वाले अजित पवार अब दुनिया में नही हैं। जब अजित पवार का निधन 66 वर्ष की उम्र में हो गया है, तो उनके सियासी सफर की चर्चा जोरों पर है। मालूम हो कि 22 जुलाई 1959 को महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले में जन्मे अजित पवार ने महज 20 की उम्र में ही राजनीति शुरू कर दी थी। पहले वे शरद पवार की छत्रछाया में बढ़े और बारामती को अपना गढ़ बनाया।
1982 में अजित पवार सहकारी चीनी मिल के बोर्ड के लिए चुने गए। इसके बाद उनका नेटवर्क लगातार मजबूत होता गया और सुगर मिलों में उनकी तूती बोलने लगी। क्षेत्रीय स्तर पर लगातार मजबूत हो रहे अजित पवार 1991 में पुणे जिला केंद्रीय सहकारी बैंक के अध्यक्ष बने और लगातार 16 वर्ष तक इस पद पर कायम रहे। 1991 में कांग्रेस ने उन्हें बारामती से चुनाव लड़ाया और वे संसद पहुंचने में सफल रहे। हालांकि, जल्द ही सीट खाली करनी पड़ी क्योंकि शरद पवार पीवी नरसिम्हा राव की कैबिनेट में रक्षा मंत्री बने थे।
शरद पवार ने जब जिम्मेदारी संभाली थी, तब वे किसी सदन के सदस्य नहीं थे। ऐसे में भतीजे अजित पवार ने बिना सोचे अपने पद की बलि दी और शरद पवार सांसद चुने गए। हालांकि, अजित पवार उसी वर्ष विधानसभा चुनाव लड़े और जीए। यहां से उन्होंने सियासी सीढ़ी चढ़ी और लगातार 1993, 1995, 1999, 2004, 2009, 2014, 2019 और 2024 में विधानसभा चुनाव जीते। इस दौरान वे 2010 , 2012 , 2019 में दो बार, 2023 और 2024 में छह बार डिप्टी सीएम बनने में सफल रहे। अंतत: डिप्टी सीएम रहते ही 28 जनवरी 2026 को बारामती विमान हादसे में उनका निधन भी हो गया।
अजित दादा का कारोबारी राज?
सूबे के 6 बार डिप्टी सीएम सीएम अजित पवार पूरी तरह से राजनीति पर निर्भर थे। आय से लेकर दिनचर्या तक सियासत से जुड़ी थी। शुरुआत में उन्होंने जरूर अपने सुगर मिल नेटवर्क के दम पर वहां से खुद को खड़ा किया। पुणे सहकारिता बैंक पर एकछत्र राज कर भी अजित पवार आर्थिक रूप से और सशक्त हुए। हाल के वर्षों में वे पूरी तरह राजनीति में मशगूल थे। उनकी पत्नी भी राज्यसभा सांसद थीं। वहीं बेटे पार्थ और जय पवार कारोबार में व्यस्त हैं। यही ‘अजित दादा’ के जीवन से जुड़े तथ्य हैं जिनकी बदौलत वे महाराष्ट्र के दूसरे सबसे ताकतवर व्यक्ति डिप्टी सीएम की कुर्सी तक पहुंचने में सफल रहे थे।





