Diesel-ATF-Export-Duty: मिडिल ईस्ट में जारी युद्ध के बीच केंद्र सरकार का महत्वपूर्ण फैसला, डीजल और एविएशन टर्बाइन फ्यूल के एक्सपोर्ट ड्यूटी में बड़ा उलटफेर

Diesel-ATF-Export-Duty: मिडिल ईस्ट में जारी युद्ध जैसे हालातों के बीच भारत सरकार ने पेट्रोलियम सेक्टर को लेकर एक अहम कदम उठाया है। जो कई मायनों में गेमचेंजर साबित हो सकता है।

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फाइल फोटो

Diesel-ATF-Export-Duty: मिडिल ईस्ट में जारी युद्ध जैसे हालातों के बीच भारत सरकार ने पेट्रोलियम सेक्टर को लेकर एक अहम कदम उठाया है। डीजल (Diesel) और एविएशन टर्बाइन फ्यूल (ATF) के एक्सपोर्ट ड्यूटी में बड़ा बदलाव किया गया है, जिसका सीधा असर तेल कंपनियों, एयरलाइन इंडस्ट्री और आम लोगों पर पड़ सकता है। गौरतलब है कि वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में जबरदस्त उतार चढ़ाव देखने को मिल रहा है। जिससे दुनिया के कई देशों की टेंशन बढ़ गई है। मीडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के कारण सप्लाई चेन प्रभावित हुई है। वहीं सरकार का यह फैसला किया है ताकि घरेलू बाजार में ईंधन की उपलब्धता सुनिश्चित की जा सके। आईए समझते है इसके मायने।

Diesel-ATF-Export-Duty पर केंद्र सरकार का महत्वपूर्ण फैसला

बीते दिन यानि शनिवार को डीजल और एविएशन टर्बाइन फ्यूल (एटीएफ) पर एक्सपोर्ट ड्यूटी में बड़ा इजाफा कर दिया है। जानकारी के मुताबिक केंद्र सरकार ने डीजल पर निर्यात शुल्क 21.5 रूपये प्रति लीटर से बढ़ाकर 55.5 रुपए प्रति लीटर कर दिया गया है।

वहीं एटीएफ शुल्क 29.5 रुपए से बढ़ाकर 42 रुपए प्रति लीटर कर दिया गया है। डीजल एक्सपोर्ट में बढ़ोतरी का मकसद घरेलू बाजार में डीजल की कमी न हो। कीमतों को नियंत्रण में रखा जा सके। रिफाइनरी कंपनियों को संतुलन बनाने का मौका मिले। वहीं अब सवाल है कि आम लोगों पर इसका क्या असर पड़ेगा। सबसे पहले – डीजल-पेट्रोल की कीमतों में स्थिरता आ सकती है। ट्रांसपोर्ट लागत नियंत्रित रह सकती है।

क्यों लिया गया यह फैसला?

मिडिल ईस्ट में जारी संघर्ष के कारण अंतरराष्ट्रीय तेल सप्लाई पर दबाव बढ़ गया है। इस क्षेत्र से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल दुनिया भर में सप्लाई होता है। ऐसे में किसी भी तरह की अस्थिरता का असर सीधे भारत जैसे आयात-निर्भर देशों पर पड़ता है। सबसे खास बात है कि घरेलू ईंधन आपूर्ति को सुरक्षित रखने, कीमतों में अचानक उछाल को रोकने, रिफाइनरी सेक्टर को संतुलन देने समेत कई अन्य चीजें शामिल है।

वहीं एविएशन टर्बाइन फ्यूल पर असर की बात करें तो एयरलाइंस की ऑपरेटिंग कॉस्ट में बदलाव आ सकता है। अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के किराए प्रभावित हो सकते हैं। एविएशन कंपनियों को राहत या दबाव—दोनों स्थितियां बन सकती हैं।

 

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