Assembly Elections 2026: तीखी बयानबाजी के साथ आरोप-प्रत्यारोप का दौर इस बात का पुख्ता संकेत हैं कि चुनावी संग्राम छिड़ चुका है। यहां बात केरलम के साथ तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और असम के संदर्भ में हो रही है। इन सभी राज्यों में मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर सुर्खियों में है। एसआईआर को लेकर चुनावी राज्यों में हो-हल्ला मचा है। सर्वाधिक बयानबाजी पश्चिम बंगाल में हो रही है।
बंगाल में ममता बनर्जी की टीएमसी सत्ता में काबिज है। यहां एसआईआर प्रक्रिया के तहत कुल 6366952 वोटर्स के नाम कटे हैं। तमिलनाडु में 74 लाख से अधिक मतदाताओं के नाम कटे हैं। इसको लेकर टीएमसी, डीएमके चुनाव आयोग पर हमलावर है। सवाल है कि क्या विपक्षी दलों के आक्रामक रुख का लाभ विधानसभा चुनाव 2026 में भी मिल सकता है? आइए इस सवाल का जवाब ढूंढ़ने की कोशिश करते हैं।
तमिलनाडु से बंगाल, केरलम तक SIR पर सियासी उबाल! – Assembly Elections 2026
चुनावी राज्य तमिलनाडु से केरलम, असम और बंगाल तक एसआईआर को लेकर सियासी उबाल है। इसमें सर्वाधिक बयानबाजी बंगाल में देखने को मिल रही है। बंगाल में ममता बनर्जी की पार्टी मुखर रूप से एसआईआर का जिक्र कर केन्द्र सरकार और चुनाव आयोग को सीधे निशाने पर ले रही है। टीएमसी बार-बार एसआईआर प्रक्रिया में गड़बड़ी और चुनाव आयोग को बीजेपी के इशारे पर काम करने का आरोप लगा रही है।
तमिलनाडु की बात करें तो यहां द्रविड़ राजनीति करने वाले डीएमके भी एसआईआर मुद्दे को लेकर मुखर है। तमिलनाडु में एसआईआर प्रक्रिया के दौरान कुल 74 लाख से अधिक मतदाताओं के नाम कटे हैं। केरलम में भी करीब 9 लाख मतदाताओं के नाम कटे हैं। वहीं असम में जिन मतदाताओं के नाम कटे हैं उनकी संख्या 2.43 लाख के आस-पास है। इसी का जिक्र कर सीएम एमके स्टालिन मुखर हैं और केन्द्र को निशाने पर ले रहे हैं। एसआईआर का मुद्दा चुनावी राज्यों में सियासी उबाल का कारण है।
क्या DMK, वाम दल और TMC को चुनाव में मिलेगा फायदा?
इस सवाल का पुख्ता जवाब भविष्य के गर्भ में जो 4 मई को चुनाव नतीजों की घोषणा के साथ स्पष्ट हो सकेगा। तमिलनाडु में डीएमके तो केरलम में वाम दल, कांग्रेस और बंगाल में टीएमसी एसआईआर मुद्दे को लेकर मुखर हैं। ममता बनर्जी सड़क से सदन तक इस मुद्दे पर बोल चुकी हैं। इन राज्यों में बीजेपी के प्रतिद्वंदी लगातार लोगों के बीच एसआईआर मुद्दे को लेकर एक नैरेटिव सेट करना चाहते हैं।
हालांकि, स्थिति बदली नजर आ रही है। विधानसभा चुनाव 2026 में महंगाई, रोजगार, कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दों पर केन्द्रित होता नजर आ रहा है। धार्मिक व जातिय आधार पर गोलबंदी भी कहीं-कहीं सियासी समीकरण को प्रभावित कर रही है। ऐसे में ये कहना कि एसआईआर पर छिड़े संग्राम का लाभ डीएमके, टीएमसी और वाम दलों को हो सकता है, थोड़ी जल्दबाजी होगी। इसके लिए सही समय का इंतजार ही एकमात्र विकल्प है।






