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Delimitation के बाद क्या बदलेगा देश का सियासी समीकरण? बड़ी लोकसभा से किन-किन चुनौतियों का करना पड़ सकता है सामना? जानें

Delimitation के बाद क्या देश का सियासी समीकरण बदल जाएगा? सियासी गलियारों में सुर्खियों के बीच ये सवाल तेजी से उठ रहे हैं। इसके अलावा बड़ी लोकसभा होने पर आने वाली चुनौतियों के संबंध में भी संभावनाएं व्यक्त की जा रही हैं।

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By: Gaurav Dixit

Published: अप्रैल 17, 2026 11:48 पूर्वाह्न

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Delimitation: उत्तर से लेकर दक्षिण और पूरब से पश्चिम तक के राज्यों में परिसीमन का मुद्दा छाया है। खबर है कि केन्द्र सरकार लोकसभा में सीटों की संख्या बढ़ाने के संबंध में विचार कर रही है। इसको लेकर तमिलनाडु, कर्नाटक, केरल जैसे राज्यों में संग्राम छिड़ा है।

यूपी, दिल्ली, मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तराखंड जैसे राज्य डीलिमिटेशन का स्वागत कर रहे हैं। इस बीच सवाल उठ रहे हैं कि क्या परिसीमन देश का सियासी समीकरण बदलेगा? यदि लोकसभा में सीटों की संख्या बढ़ती है, तो किन-किन चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है? इन सवालों का जवाब ढूंढ़ने के साथ हालिया घटनाक्रम पर चर्चा करेंगे।

क्या Delimitation के बाद बदलेगा देश का सियासी समीकरण?

इस सवाल का जवाब देते हुए कई सारे तर्क पेश किए जा रहे हैं। यदि सवाल का जवाब हां के रूप में दे तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। दरअसल, प्रस्तावित डीलिमिटेशन के बाद लोकसभा में सीटों की संख्या 850 होने की बात कही जा रही है वर्तमान 543 से कहीं ज्यादा है।

इससे स्थानीय स्तर पर समीकरण बदल जाएंगे। नेताओं की राजनीतिक भागीदारी बढ़ेगी। लोकसभा क्षेत्रों का दायरा कम होगा और क्षेत्रीय दलों को उभरने का मौका मिलेगा। इससे व्यापक तौर पर सियासी समीकरण प्रभावित देखने को मिल सकते हैं।

एक और प्रमुख बात ये है कि डीलिमिटेशन के बाद ही महिला आरक्षण बिल का रास्ता साफ हो पाएगा। इसके तहत लोकसभा की 33 फीसदी सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित की जा सकेंगी। क्षेत्रीय दलों पर परिसीमन का अनुकूल और प्रतिकूल दोनों प्रभाव पड़ने की संभावना है।

यूपी से बिहार, राजस्थान, मध्य प्रदेश, हरियाणा, दिल्ली, उत्तराखंड, केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु समेत सभी राज्यों में लोकसभा सीटों की संख्या जनसंख्या के अनुपात में बढ़ेंगी। ये दर्शाता है कि कैसे व्यापक तौर पर डीलिमिटेशन देश की सियासी समीकरण को बदलेगा।

बड़ी लोकसभा से किन-किन चुनौतियों का करना पड़ सकता है सामना? 

कई चुनौतियां हैं जो लोकसभा में सीटों की संख्या बढ़ने पर सामने आएंगी। दावा किया जा रहा है कि परिसीमन के बाद क्षेत्रीय असंतुलन देखने को मिल सकता है। इससे दक्षिण भारत की तुलना में उत्तर में सीटों की संख्या बढ़ेगी। इसको लेकर उत्तर बनाम दक्षिण का विवाद छिड़ सकता है।

बड़ी लोकसभा में सभी सांसदों को अपनी बात रखने के लिए और भी कम समय मिलेगा। सदन का प्रबंधन भी पहले की तुलना में मुश्किल होगा। सांसदों पर होने वाले खर्च की रकम भी बढ़ जाएगी। साथ ही संघवाद पर संकट आ सकता है। हालांकि, सरकार इन तमाम चुनौतियों का खारिज करते हुए परिसीमन के पक्ष में मजबूती से खड़ी है।

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Gaurav Dixit

गौरव दीक्षित पत्रकारिता जगत के उभरते हुए चेहरा हैं। उन्होनें चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय से अपनी पत्रकारिता की डिग्री प्राप्त की है। गौरव राजनीति, ऑटो और टेक संबंघी विषयों पर लिखने में रुची रखते हैं। गौरव पिछले दो वर्षों के दौरान कई प्रतिष्ठीत संस्थानों में कार्य कर चुके हैं और वर्तमान में DNP के साथ कार्यरत हैं।
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