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2026 बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले लोगों को सता रहा SIR का खौफ! क्या ममता बनर्जी की खिसक सकती है सियासी जमीन? सन्न कर देगा ख़बर

SIR: चुनाव आयोग पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) कार्यक्रम शुरू करने की तैयारी में जुटा है। जिसका असर सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के चेहरों पर साफ दिखाई दे रहा है। चुनाव आयोग ने 27 अक्टूबर को होने वाली अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस के बारे में पूरी जानकारी साझा नहीं की है। अटकलें लगाई जा रही हैं कि चुनाव आयोग जल्द ही 10 से 15 राज्यों में विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान का पहला चरण शुरू करेगा। इनमें 2026 में विधानसभा चुनाव होने वाले राज्य भी शामिल हैं।

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By: Rupesh Ranjan

Published: अक्टूबर 26, 2025 10:06 अपराह्न | Updated: अक्टूबर 26, 2025 10:49 अपराह्न

Mamata Banerjee (File Photo)
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SIR: पश्चिम बंगाल में सभी राजनीतिक दलों ने आगामी विधानसभा चुनावों के लिए अपनी तैयारियां शुरू कर दी हैं। इसी बीच चुनाव आयोग मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान शुरू करने की तैयारी में जुटा है। इसके लिए बैठकें जारी हैं। जिस पर अंतिम फैसला आना बाकी है। बहरहाल, कुल मिलाकर कहा जा रहा है कि चुनाव आयोग विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) कार्यक्रम का पहला चरण जल्द शुरु करेगा। जिसमें 10 से 15 राज्य शामिल होंगे। खास बात यह है कि इनमें 2026 में विधानसभा चुनाव होने वाले राज्य भी शामिल हैं। जिनमें पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल, असम और पुडुचेरी शामिल हैं, जहां अगले साल चुनाव होने हैं। एसआईआर के मुद्दे पर अब पश्चिम बंगाल में सियासी संग्राम छिड़ गया है। जिसका असर सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के चेहरों पर साफ दिखाई दे रहा है।

चुनाव से पहले किसको सता रहा SIR का डर?

गौरतलब है कि मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण का उद्देश्य वास्तविक मतदाताओं की पहचान करना तथा उनके संवैधानिक मताधिकार का पूर्ण प्रयोग करने के लिए प्रेरित करना है। इसकी एक झलक हाल ही में बिहार में देखने को मिली। पहले बिहार में 7 करोड़ 89 लाख 69 हजार 844 मतदाता थे। इनमें से 65 लाख लोगों के नाम एसआईआर में हटा दिए गए। जिसके बाद 7.24 करोड़ मतदाता बचे। हालाँकि, हाल ही में अंतिम मतदाता सूची जारी की गई जिसमें 21 लाख नए मतदाताओं के नाम शामिल होने की जानकारी साझा की गई। बिहार में हुए विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर विपक्ष ने काफी हंगामा किया और मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुँच गया।

आपको बता दें कि विपक्ष का आरोप रहा है कि चुनाव आयोग इस विशेष गहन पुनरीक्षण की आड़ में लोगों की नागरिकता की पिछले दरवाजे से जाँच कर रहा है। हालाँकि, चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में आश्वस्त किया है कि अगर किसी का नाम मतदाता सूची से हट गए हैं तो इसका मतलब यह नहीं है कि उसकी नागरिकता रद्द कर दी गई है। इन सबके बावजूद बिहार और देश भर में विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान को लेकर चर्चाएँ ज़ोरों पर रही हैं। खबर लिखे जाने तक चुनाव आयोग ने 27 अक्टूबर को होने वाली अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस के बारे में पूरी जानकारी साझा नहीं की है। अटकलें लगाई जा रही हैं कि चुनाव आयोग जल्द ही विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान का पहला चरण शुरू करेगा। पश्चिम बंगाल में वर्तमान में कुल 80,000 मतदान केंद्र हैं, जिनके आने वाले समय में बढ़कर लगभग 94,000 होने की उम्मीद है।

इसका मतलब है कि पश्चिम बंगाल में लगभग 14,000 नए मतदान केंद्र बनाए जा सकते हैं। लेकिन, पश्चिम बंगाल की सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के चेहरे के भाव बता रहे हैं कि वे राज्य में विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान चलाने से हिचकिचा रही हैं। सूत्रों की मानें तो टीएमसी को डर है कि एसआईआर के दौरान उनके प्रशंसक जो अवास्तविक हैं उनके नाम मतदाता सूचि से हटा दिया जाएगा। इसको ऐसे समझिए कि जब बिहार में एसआईआर के दौरान लाखों लोगों के नाम हटाए गए, तो विपक्ष के द्वारा एक नकारात्मक धारणा विकसित की गई। जिसमें “वोटर्स लिस्ट में धांधली” और अन्य मुद्दों पर चर्चा का बाजार गर्म रहा। जबकि हकीकत यह है कि चुनाव आयोग यह सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है कि प्रत्येक योग्य वोटर्स का नाम मतदाता सूची में शामिल हो।

पश्चिम बंगाल में एसआईआर: क्या ममता बनर्जी की खिसक सकती है सियासी जमीन?

मालूम हो कि पिछले कुछ वर्षों में ममता बनर्जी के प्रशंसकों की संख्या में भारी वृद्धि हुई है। इसका असर कोलकाता से दूर बंगाल के गांवों में भी देखा जा सकता है। जहां लोग बुनियादी सुविधाओं के अभाव के बावजूद उनकी तारीफ करते नहीं थकते। ऐसे में यह समझना ज़रूरी है कि ममता बनर्जी और उनकी पार्टी टीएमसी विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान से क्यों डरी हुई हैं। इसका जवाब जानने से पहले यह जानना ज़रूरी है कि 2021 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के अंतिम नतीजों के अनुसार, तृणमूल कांग्रेस ने 213 सीटें जीतीं, जो सदन में उसकी अब तक की सबसे ज़्यादा सीटें हैं।

वहीं, वोट शेयर की बात करें तो उसे रिकॉर्ड 47.9% वोट मिले। 2016 में उसे 211 सीटें मिली थीं और वोट शेयर 44.9% था। इसका मतलब है कि टीएमसी ने समय के साथ तरक्की की है। दोनों चुनावों के बीच तृणमूल कांग्रेस को 3% वोट शेयर का फ़ायदा हुआ। यह समझ लीजिए कि टीएमसी को डर सता रहा है कि बिहार जैसा नज़ारा बंगाल में भी दोहराया जा सकता है। इसकी वजह यह है कि ऐसे मतदाताओं की एक लंबी सूची है जिनके नाम एक से ज़्यादा जगहों पर दर्ज रहे हैं। चुनावों के दौरान इन मतदाताओं के महत्व का किसी भी पार्टी के फायदे या नुकसान के लिए इस्तेमाल किया जाता रहा है।

मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान अपात्र मतदाताओं की पहचान करके उन्हें सूची से हटा दिया जाता है, जबकि योग्य मतदाताओं को बरकरार रखा जाता है, उनके वैध दस्तावेज़ और मोबाइल नंबर भी अपडेट किए जाते हैं। इससे यह सुनिश्चित होता है कि केवल योग्य मतदाता ही सूची में रहें। इसलिए, अगर पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण किया जाता है, तो सही वोटर्स का डेटा सार्वजनिक किया जा सकेगा। इससे अपात्र वोटर्स की एक लंबी सूची मतदाता सूची से बाहर भी हो सकती है। अटकलों के मद्देनजर अगर यह 2026 के पश्चिम बंगाल आम चुनाव से पहले होता है, तो निश्चित ही किसी भी सत्तारूढ़ दल के लिए बेचैनी स्वाभाविक हो सकती है।

ये भी पढ़ें: Bihar Assembly Election 2025: लालू के लाल तेज प्रताप करेंगे कमाल! या फिर हो जाएंगे बोल्ड, जानें महुआ सीट का चौंकाने वाले समीकरण

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Rupesh Ranjan

Rupesh Ranjan is an Indian journalist. These days he is working as a Independent journalist. He has worked as a sub-editor in News Nation. Apart from this, he has experience of working in many national news channels.
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